संबोधि

स्वाध्याय

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आचार्य महाप्रज्ञ

आज्ञावाद

भगवान् प्राह

इससे यह स्पष्ट फलित होता है कि जीना अच्छा भी है और बुरा भी; मरना अच्छा भी है और बुरा भी।
जो शब्द जितना अधिक व्यवहृत हो जाता है, उतना ही अधिक वह रूढ़ बन जाता है। संयम की जो गरिमा प्रारंभ में उपलब्ध थी वैसी आज नहीं है। वह रूढ़ हो गया। यह केवल संयम शब्द के साथ ही ऐसा हुआ हो यह नहीं, सबके साथ ही कालांतर में ऐसा हो जाता है। जितने भी क्रियाकांड आज व्यवहृत हैं, उनके प्रवृत्ति-काल में एक सौंदर्य था, जीवंतता थी और चैतन्य था। कालचक्र के प्रवाह से वे शव बनकर रह गए, चैतन्य चला गया।
संयम का अर्थ हैनिष्क्रियता, क्रिया का सर्वथा निरोध हो जाना। इसका फलितार्थ होता हैशुद्धात्मा की उपलब्धि, किंतु यह भी स्पष्ट है कि पूर्ण अक्रियत्व प्रथम चरण में ही उपलब्ध नहीं होता। उसके लिए क्रमश: आरोहण की अपेक्षा होती है। यद्यपि संयम का पूर्ण ध्येय वही है, किंतु प्राथमिक अभ्यास की द‍ृष्टि से व्यक्‍ति को अपनी अशुभ प्रवृत्तियों का संवरण करना होगा। महाव्रत, अणुव्रत आदि की साधना अशुभ-विरति की साधना है। जैसे-जैसे साधक आगे बढ़ता है सामायिक, समता, संवर आता है और इंद्रिय और मन का निरोध करने में कुशल होता चला जाता है। एक क्षण आता है कि वह बाहर से सर्वथा शून्य-बेहोश तथा अंतर में पूर्ण सचेतन होता है। यही क्षण शुद्ध स्वात्मोपलब्धि का है। जहाँ बाह्य आकर्षणों का आधिपत्य स्वत: ध्वंस हो जाता है, वही वास्तविक संयम है।

(10) हिंसाऽनृतं तथा स्तेयाऽब्रह्मचर्यपरिग्रहा:।
ध्रुवं प्रवृत्तिरेतेषां, असंयम इहोच्यते॥

हिंसा, असत्य, चौर्य, अब्रह्मचर्य और परिग्रह की प्रवृत्ति असंयम कहलाती है।

(11) ऐतेषां विरति: प्रोक्‍त:, संयमस्तत्त्ववेदिना।
पूर्णा सा पूर्ण एवासौ, अपूर्णाया×च सोंशत:॥

तत्त्वज्ञों ने हिंसा आदि की विरति को ‘संयम’ कहा है। पूर्ण विरति से पूर्ण संयम और अपूर्ण विरति से आंशिक संयम होता है।
जो व्यक्‍ति हिंसा में रचा-पचा रहता है, वह असंयमी है; जो इनका आंशिक नियंत्रण करता है वह संयमासंयमी है, श्रावक है और जो इनका पूर्ण त्याग करता है वह संयमी है, साधु है। जितने अंशों में उनका त्याग होता है, उतने अंशों में संयम की प्राप्ति होती है और जितना अत्याग-भाव है वह असंयम है।

(12) पूर्णस्याराधक: प्रोक्‍त:, संयमी मुनिरुत्तम:।
अपूर्णाराधक: प्रोक्‍त:, श्रावकोऽपूर्णसंयमी॥

पूर्ण संयम की आराधना करने वाला संयमी उत्तम मुनि कहलाता है और अपूर्ण संयम की आराधना करने वाला अपूर्ण संयमी या श्रावक कहलाता है।
(क्रमश:)