व्यवहार में रहे निरहंकारिता और विनयभाव : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

गांधीधाम। 05 मार्च, 2025

व्यवहार में रहे निरहंकारिता और विनयभाव : आचार्यश्री महाश्रमण

भगवान महावीर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ गांधीधाम में स्थित अमर पंचवटी में पंद्रह दिवसीय प्रवास हेतु पधारे। महावीर आध्यात्मिक समवसरण में मंगल देशना प्रदान करते हुए पूज्यप्रवर ने फरमाया कि मनुष्य के जीवन में व्यवहार कुशलता और आध्यात्मिकता दोनों आवश्यक हैं। अहंकार एक ऐसा तत्व है, जो हमारे व्यवहार को दूषित कर सकता है। विनय से विद्या शोभित होती है, क्योंकि अहंकार और विनय में शत्रुता होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि यदि किसी को विनय की प्रेरणा दी जाए और वह व्यक्ति इस प्रेरणा को ग्रहण करने के बजाय कुपित हो जाए, तो वह अपने ही अहित का कार्य करता है। यह वैसा ही है जैसे आती हुई लक्ष्मी को डंडे से पीटना।
जो लोग अहंकारी, उच्छृंखल या घमंडी होते हैं, वे दुखी जीवन जीते हैं, जबकि सुविनीत व्यक्ति सुखी रहते हैं। देव जगत में भी सुविनीत देवता आनंदित होते हैं, जबकि अविनीत आत्माएं दुखी रहती हैं। हमें अपने व्यवहार में निरहंकार रहना चाहिए और बड़ों के प्रति सदैव विनयभाव रखना चाहिए। हमें ज्ञान, धन और बल का अहंकार नहीं करना चाहिए। सत्ता हमें सेवा के लिए प्राप्त होती है, इसलिए उसका सदुपयोग करना चाहिए। अभिमान मदिरापान के समान है, जो विवेक को नष्ट कर सकता है।
हर पदार्थ का एक विशेष महत्व होता है। हमें अपने भीतर यह देखना चाहिए कि कौन-सी चीज़ अनावश्यक है और उसे त्यागना चाहिए। ज्ञान का अहंकार हमारे व्यवहार और चिंतन में नहीं आना चाहिए, क्योंकि यह आत्मा के लिए अवांछनीय है। जहाँ झुकने की आवश्यकता होती है, वहाँ अहंकार का त्याग करना चाहिए। कहा गया है कि अभिवादनशील व्यक्ति के चार गुणों में वृद्धि होती है - आयुष्य, विद्या, यश और बल। हमें अहंकार से मुक्त रहकर अपने व्यवहार को उत्कृष्ट बनाना चाहिए।
पूज्यप्रवर ने गांधीधाम पदार्पण के अवसर पर फरमाया कि 2013 में भी यहाँ आगमन हुआ था। यहाँ अनेक जैन समाज के लोग रहते हैं। चाहे जैन हो या अजैन, यदि कोई व्यक्ति 'गुडमैन' है, तो वह उत्तम है। इस प्रवास के दौरान हमें आध्यात्मिक लाभ उठाने का प्रयास करना चाहिए और उत्तम संस्कारों को आत्मसात करना चाहिए। इस अवसर पर साध्वीप्रमुखाश्री विश्रुतविभाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि गुरु भी गुड़ के समान त्रिदोष नाशक होते हैं। ये तीन दोष हैं—अज्ञान, अनास्था और अनाचार। आचार्यश्री गांधीधाम के लोगों के इन तीन दोषों को दूर करने के लिए पधारे हैं। जो श्रद्धा-सम्पन्न होता है, वही सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान केवल उत्तम गुरु से ही मिलता है, क्योंकि वे हमारी ज्ञान चेतना को जागृत करने वाले होते हैं। कार्यक्रम में स्थानीय तेरापंथी सभा के अध्यक्ष अशोक सिंघवी तथा बृहद् जैन समाज की ओर से चंपालाल
परीख ने अपने उद्गार व्यक्त किए। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने अपनी भावपूर्ण प्रस्तुति दी। तेरापंथ महिला मंडल की सदस्याओं ने स्वागत गीत का संगान किया। तेरापंथ युवक परिषद के सदस्यों ने भी स्वागत गीत का संगान किया। आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में उपस्थित गुजरात सरकार के पूर्व मंत्री वासनभाई अहीर ने भी आचार्यश्री के स्वागत में अपनी भावाभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।