
गुरुवाणी/ केन्द्र
वैर से नहीं समता और सहिष्णुता से संभव है शांति : आचार्यश्री महाश्रमण
जिनशासन प्रभावक आचार्यश्री महाश्रमणजी का वसही के भद्रेश्वर जैन तीर्थ में पदार्पण हुआ। अमृत देशना प्रदान करते हुए परम पूज्य ने फरमाया कि क्षमा एक धर्म है। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी अवहेलना करने वाले के प्रति क्षमा का भाव बनाए रखना एक साधना है। जब अहंकार पर चोट पड़ती है और फिर भी मन शांत बना रहता है, तो यह समता की साधना हो जाती है। जिसके पास क्षमा धर्म है, उसका कोई क्या बिगाड़ सकता है? जिसके हाथ में क्षमा रूपी खड्ग है, उसे दुर्जन क्या हानि पहुँचा सकता है? जैसे सूखी घास में आग लग सकती है, लेकिन सूखी मिट्टी पर डाली गई आग कुछ ही देर में बुझ जाती है, वैसे ही यदि कोई कितना भी कटु बोले और सामने से कोई उत्तर न मिले, तो वह विवाद समाप्त हो जाता है। 'मैं सबको क्षमा करता हूँ, सब मुझे क्षमा करें'—यह समानता का आदर्श बन जाता है।
सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भाव रखना और किसी से बैर-द्वेष न रखना एक उच्च आध्यात्मिक विचारधारा है। ईंट का जवाब पत्थर से देने के बजाय पुष्पों से देना ही सच्चा अध्यात्म है। जहाँ धर्म है, वहाँ क्षमा और शांति को ही लक्ष्य बनाया जाना चाहिए। यदि हम क्षमा भाव में रहेंगे, तो एक दिन सामने वाला भी क्षमा के भाव में आ सकता है। वैर से वैर शांत नहीं होता, बल्कि समता और सहिष्णुता से ही शांति संभव है।
परिवार, समाज, संगठन और समूह में न्याय, नीति और सौहार्द बना रहना चाहिए। सौहार्द ही सशक्त समाज का आधार है। जैसे कोई व्यक्ति उल्टी करता है, तो हम भी उसे देखकर उल्टी न करने लगें, उसी प्रकार हमें नकारात्मकता को ग्रहण नहीं करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में भी समता और शांति बनी रहनी चाहिए, क्योंकि यही एक अच्छी आत्मा के लिए श्रेष्ठ मार्ग है। पूज्यवर के स्वागत में भद्रेश्वर तीर्थ की ओर से प्रवीण भाई शाह ने अपनी भावनाएँ अभिव्यक्त कीं। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।