लोभ को कम कर जीवन को बनाएं सार्थक : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

मुंद्रा। 28 फरवरी, 2025

लोभ को कम कर जीवन को बनाएं सार्थक : आचार्यश्री महाश्रमण

अहिंसा यात्रा के प्रवर्तक आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रातः लगभग 12 किलोमीटर का विहार कर मुंद्रा के आर्ट्स एंड कॉमर्स कॉलेज में प्रवास हेतु पधारे। पावन उपदेश प्रदान करते हुए युगदृष्टा ने कहा कि हमारी आत्मा अनंत काल तक संसार में भ्रमण कर रही है। यह निरंतर जन्म-मरण का चक्र क्यों चल रहा है? यह विचारणीय प्रश्न है। यह चक्र—जन्म, मरण, पुनर्जन्म—अविरल रूप से चलता आ रहा है। इस जन्म-मरण के चक्र का मुख्य कारण आत्मा के भीतर विद्यमान कषाय हैं। कर्म, जो आत्मा को संचालित करता है, उसे नित नए जन्मों में भेजता रहता है। इन कषायों में से प्रमुख कषाय है—लोभ। जैन वांग्मय में चार संज्ञाएँ बताई गई हैं—मैथुन, आहार, भय और परिग्रह। इनमें परिग्रह संज्ञा लोभ से संबंधित है।
लोभ एक गहरी जड़ें जमाने वाला कषाय है। अन्य तीन कषाय यदि शांत भी हो जाएँ, तो भी लोभ दसवें गुणस्थान तक बना रहता है। यह एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो अन्य कषायों को भी पोषण देती है। यहाँ तक कि साधुओं में भी छठे गुणस्थान तक लोभ उभर सकता है। गृहस्थों में तो स्वाभाविक रूप से परिग्रह और लोभ की प्रवृत्ति पाई जाती है, बस उसकी तीव्रता भिन्न हो सकती है। गृहस्थ जीवन में परिग्रह स्वाभाविक रूप से होता है, जबकि साधु अणगार होते हैं—वे संयोगों से विमुक्त रहते हैं। यही गृहस्थ और साधु के बीच का सबसे बड़ा अंतर है। गृहस्थ सांसारिक संबंधों से बंधे होते हैं, जबकि साधु संबंधातीत चेतना में स्थित होते हैं। स्वेच्छा से भोगों का त्याग करना ही सच्चे त्यागी की पहचान है। साधुओं में अलोभ चेतना प्रकट होनी चाहिए और गृहस्थों में भी लोभ की प्रवृत्ति न्यूनतम होनी चाहिए। इच्छाओं का सीमाकरण आवश्यक है। श्रावकों के व्रत संयम को दृढ़ बनाने वाले होते हैं।
ज्ञान के साथ संस्कारों का भी विकास होना चाहिए। विद्यार्थियों को कॉलेज से केवल नॉलेज ही नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त आचरण की शिक्षा भी प्राप्त होनी चाहिए। अहिंसा और संयम के साथ आध्यात्मिक सेवा की भावना भी विकसित होनी चाहिए। जीवन में कदाचार न होकर सदाचार का वास हो। भ्रष्टाचार के स्थान पर शिष्टाचार को प्राथमिकता मिले। हमारे जीवन में लोभ अतिरेक न बने, बल्कि नियंत्रित रहे। जीवन में अलोभ की चेतना जागे। गृहस्थ के लिए इच्छा परिमाण, भोगोपभोग परिमाण व्रत की बात आती है। पूरा नहीं तो उपभोग का अल्पीकरण तो करे। लोभ को कम कर व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।
कार्यक्रम में आचार्य प्रवर ने कॉलेज के विद्यार्थियों को सद्भावना, नैतिकता एवं नशामुक्ति के संकल्प स्वीकार करवाए। स्वागत के क्रम में मुंद्रा नगरपालिका की मेयर रचना जोशी ने अणुव्रत अनुशास्ता का अभिनंदन किया। समस्त जैन समाज की ओर से भोगीलाल भाई मेहता, कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. फफल शाह ने विचारों की अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।