भोग से नहीं, त्याग से होती है तृप्ति : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

देशलपुर कंठी। 26 फरवरी, 2025

भोग से नहीं, त्याग से होती है तृप्ति : आचार्यश्री महाश्रमण

तीर्थंकर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी 12 किलोमीटर का विहार कर देशलपुर कंठी में स्थित पंचायत प्राथमिक ग्रुप स्कूल में पधारे। आध्यात्मिक प्रशिक्षण प्रदान कराते हुए अध्यात्म पुरूष ने फरमाया कि दो शब्द है - एक है भोग और दूसरा है योग। भोग और योग दोनों में विपरीतता भी है। भोग व्यक्ति को बन्धन से बान्धने वाला होता है वही योग व्यक्ति को मुक्ति की दिशा में ले जाने वाला, मुक्त कराने वाला होता है। भोग को अधर्म और त्याग को धर्म कहा गया है। योग भी धर्म है। मोक्ष का उपाय योग है। वह ज्ञान रूप, श्रद्धा रूप और चारित्र रूप होता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र की साधना योग होती है। मोक्ष से आत्मा को जोड़ने वाली सारी धर्म की प्रवृति योग होती है। भोगासक्त व्यक्ति कर्मों से चिपक जाता है जैसे श्लेष्म से मक्खी। पहले व्यक्ति भोग भोगता है, फिर मानो भोग व्यक्ति को भोगने लग जाते हैं।
अध्यात्म की साधना में खुद की आत्मा को साध लें। खुद की इन्द्रियों का वशीकरण कर लें। आसक्तिजनक भोगों में जो डूबा हुआ है, मोक्ष से विपरीत भावना वाला है वह बाल, मन्द और मूढ़ है। हमें पदार्थों का उपभोग करना पड़ता है पर उसमें आसक्ति न हो। संयम, सादगी और संतोष रखें। धर्म ध्यान करें, सेवा का कार्य करें। भोग का सीमाकरण करें। आवश्यकता की तो पूर्ति हो सकती है पर इच्छाएं तो असीमित होती हैं, इच्छाओं का परिसीमन करें। साधु का जीवन तो संयममय ही होना चाहिए। साधु हो या गृहस्थ रास्ता तो एक ही है। धीरे-धीरे त्याग की तरफ आगे बढ़ना चाहिये। पूज्यवर के स्वागत में जिनेश भाई मेहता एवं प्राथमिक शाला के आचार्य नारायण भाई गढ़वी ने अपनी श्रद्धा-भक्ति अभिव्यक्त की। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।