हर व्यक्ति के जीवन में आए अणुव्रत : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लूणी। 01 मार्च, 2025

हर व्यक्ति के जीवन में आए अणुव्रत : आचार्यश्री महाश्रमण

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ मुंद्रा से लगभग 9 किलोमीटर का विहार कर लूणी, कच्छ पधारे। आज से लगभग 76 वर्ष पूर्व, आचार्यश्री तुलसी ने इसी दिन अणुव्रत आंदोलन का शुभारंभ किया था। इस पावन अवसर पर अणुव्रत अनुशास्ता ने फरमाया कि आज फाल्गुन शुक्ल द्वितीया है, जो परमपूज्य आचार्य कालूगणी का जन्म दिवस भी है। तेरापंथ धर्मसंघ की आचार्य परंपरा में आचार्यश्री भिक्षु के उत्तरवर्ती अष्टम आचार्य परमपूज्य कालूगणी हुए। उनका संपूर्ण जीवन मात्र 60 वर्षों का था। आचार्यश्री तुलसी का जन्म दिवस कार्तिक शुक्ल द्वितीया को होता है। आचार्यश्री कालूगणी के दो शिष्य—मुनि तुलसी और मुनि नथमलजी—क्रमशः तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य बने और दोनों ही युगप्रधान आचार्य हुए। आचार्य श्री कालूगणी का आचार्यकाल 27 वर्षों तक रहा। जब उनकी जन्मशताब्दी का समय आया, तब आचार्यश्री तुलसी छापर में विराजमान थे। उन्होंने मघवागणी की कृपा प्राप्त की थी। डालगणी ने प्रच्छन्न रूप से उन्हें आचार्य पद प्रदान किया, इसलिए वे प्रकट रूप से युवाचार्य नहीं रहे। मात्र 33 वर्ष की आयु में वे तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य बने।
आचार्य कालूगणी ने राजस्थान के बाहर एक चातुर्मास और एक मर्यादा महोत्सव किया था, शेष जीवन वे राजस्थान में ही रहे। उन्होंने हरियाणा और मालवा की यात्राएँ भी कीं। संस्कृत भाषा का प्रसार उनका एक महत्वपूर्ण योगदान था। उनके द्वारा दीक्षित अनेक साधु-साध्वियाँ संस्कृत भाषा के विद्वान बने। आज के ही दिन, विक्रम संवत 2005 में, आचार्यश्री तुलसी ने सरदारशहर में अणुव्रत आंदोलन का शुभारंभ किया था। यह दिन पारमार्थिक शिक्षण संस्था की स्थापना का भी दिन है। आचार्यश्री तुलसी ने तेरापंथ धर्मसंघ को अनेक महत्वपूर्ण अवदान प्रदान किए, जिनमें अणुव्रत आंदोलन प्रमुख है। आचार्यश्री भिक्षु का यह कथन—"मिथ्यात्वी की धार्मिक करणी भी मोक्ष की आराधिका होती है"— अणुव्रत आंदोलन की आधारशिला बना। यह केवल जैन अनुयायियों तक सीमित नहीं है, बल्कि जैन-अजैन सभी इसे अपना सकते हैं।
गुरुदेव तुलसी ने अणुव्रत के प्रचार के लिए अनेक लंबी यात्राएँ कीं, जिनमें कच्छ की यात्रा भी शामिल थी। अणुव्रत की स्थापना के पश्चात इस दिशा में कई संस्थाएँ भी स्थापित की गईं। अणुविभा (अणुव्रत विश्व भारती) तो बाद में अस्तित्व में आई, लेकिन वर्तमान में सभी अणुव्रत संस्थाएँ अणुविभा में समाहित हो चुकी हैं। अणुव्रत के विभिन्न केंद्रों पर आचार्यों के चातुर्मास हुए हैं। प्रति वर्ष व्यापक स्तर पर 'अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह' का आयोजन किया जाता है। अणुव्रत धर्म स्थानों पर ही नहीं बल्कि जेलों में जाएं, बाजारों पर, चौराहों तक जाएं, दुकान, ऑफिस, विद्यालयों में भी अणुव्रत पहुंचे। अणुव्रत हर व्यक्ति के जीवन में आ जाए तो वह सब जगह आ जाएगा। अहिंसा, संयम और तप का प्रभाव व्यक्ति और समाज—दोनों के जीवन में स्थायित्व ला सकता है। कार्यक्रम में अणुविभा के अध्यक्ष प्रताप दूगड़, महामंत्री मनोज सिंघवी ने अपने विचार व्यक्त किए। अणुविभा टीम द्वारा गीत का संगान किया गया। महाजन वाडी भवन की ओर से नितिन केडिया ने पूज्य प्रवर का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।