
गुरुवाणी/ केन्द्र
अकाम और शल्य रहित होने का करें प्रयास : आचार्यश्री महाश्रमण
जन-जन के उद्धारक आचार्यश्री महाश्रमणजी कच्छ प्रान्त की यात्रा करते हुए सामागोगा स्थित श्री ओपी जिन्दल विद्या निकेतन में पधारे। अमृत देशना प्रदान कराते हुए पूज्य प्रवर ने फरमाया - शास्त्र में कहा गया है कि काम शल्य है, विष है। काम की कामना करने वाले दुर्गति को प्राप्त हो जाते हैं। पांच इन्द्रियों के अपने-अपने विषय हैं, इनके प्रति आकर्षण, राग, कामनाएं हैं तो ये विषय अपने आप में शल्य की तरह नुकसान देने वाले बन सकते हैं। विष की तरह नाश करने वाले बन सकते हैं। कई व्यक्ति पदार्थों का भोग तो नहीं करते पर उन विषयों के प्रति लालसा है तो भी वे पतन की ओर गतिमान बन सकते हैं। पदार्थों के प्रति संयम रखना बड़ा ही महत्वपूर्ण होता है।
उत्तराध्ययन आगम में पांच इन्द्रियों के विषय में सुन्दर वर्णन किया गया है। साधु जीवन में जो रमण करने लग जाता है, भीतर में रमण करने लग जाता है, फिर पदार्थों के प्रति अनाकांक्षा हो सकती है। जैसे-जैसे उत्तम तत्व का बोध होता, उत्तम तत्व आत्मसात होते हैं तो सुलभ विषय के प्रति भी रूचि नहीं रहती है। पदार्थों के प्रति अनाकांक्षा और उत्तम तत्व का प्राप्त होना दोनों का परस्पर सम्बन्ध है। साधु जीवन प्राप्त होना, अध्यात्म का प्राप्त हो जाना ऊंची बात हो जाती है। साधना में आत्मरमण हो जाये, भौतिक साधन उसको दूषित न कर सके ऐसी मजबूत स्थिति बन जाये। क्षयोपशम मजबूत होता है, तो कोई संयम रत्न को चुरा नहीं सकता।
दो दृष्टियों होती है - स्वास्थ्य की दृष्टि और अध्यात्म की दृष्टि। रात्रि भोजन न करना दोनों दृष्टियों से अच्छा है। यह अध्यात्म और विज्ञान की समानता की बात है। भगवान महावीर तो वैज्ञानिक नहीं सर्वज्ञानिक थे, सर्वज्ञ थे। मैं अध्यात्म और विज्ञान में असमानता भी देखता हूं। अध्यात्म का तो परम लक्ष्य मोक्ष पाना है, पर विज्ञान में ऐसी बात नहीं है। मोक्ष प्राप्ति के लिए तो सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र और सम्यक् तप की आराधना की बात है पर विज्ञान में ऐसी बात नहीं है। अध्यात्म में तो राग-द्वेष मुक्ति की साधना है पर विज्ञान में ऐसी बात नहीं है। पूर्व की ओर चलने वाले राहगीर और पश्चिम की ओर चलने वाले राहगीर में भी कहीं कहीं मिलन हो सकता है। अध्यात्म के सिद्धान्तों को समझने में विज्ञान का सहयोग ले सकते हैं। विज्ञान को भी अध्यात्म के सहयोग से खोज करने में सहयोग मिल सकता है। दोनों में समानता-असमानता हो सकती है। हम अकाम और भीतर से भी शल्य रहित होने का प्रयास करें।
पूज्यप्रवर ने आगे फरमाया कि आज चतुर्दशी और अमावस्या का मिलन है, पक्खी भी है, हाजरी का भी प्रसंग है। आपस की चर्चाएं भी ज्ञान विकास में सामग्री देने में सहयोग दे सकती हैं। आज प्रातः चर्चा में मैंने समझाया था कि लौकिक और लोकात्तर उपकार को हम कैसे समझें ? आत्मा का उपकार लोकोत्तर उपकार है। शारीरिक और बाह्य उपकार लौकिक उपकार है। पूज्यवर ने हाजरी का वाचन कराते हुए प्रेरणाएं प्रदान करवायी। मुनि चन्द्रप्रभजी व मुनि कैवल्यकुमारजी ने आचार्यश्री की अनुज्ञा से लेखपत्र का वाचन किया। आचार्यश्री ने मुनिद्वय को 21 कल्याणक बक्सीस किए। उपस्थित चारित्रात्माओं ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया। विद्या निकेतन की ओर से संजय झा ने आचार्यश्री के स्वागत में अपनी अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।