आत्मा को बनाएं सदात्मा और महात्मा : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

बिदड़ा। 25 फरवरी, 2025

आत्मा को बनाएं सदात्मा और महात्मा : आचार्यश्री महाश्रमण

संयम के सुमेरू आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ बिदड़ा के मानव मंदिर प्रांगण में पधारे। अमृत देशना प्रदान करते हुए पूज्यवर ने कहा कि आत्मा के चार प्रकार होते हैं—परमात्मा, महात्मा, सदात्मा और दुरात्मा। परमात्मा वे होते हैं जो सिद्ध भगवान बन चुके होते हैं। अनंत सिद्ध आत्माएँ हैं, जिनका न शरीर होता है, न मन, न वाणी, न लेश्या और न योग। तीर्थंकरों और केवलज्ञानियों को भी हम परमात्मा मान सकते हैं। जो साधु पुरुष होते हैं, वे महात्मा होते हैं, क्योंकि वे साधनाशील होते हैं। सज्जन आत्माएँ सदात्मा होती हैं। वहीं, जो मिथ्या दृष्टि रखते हैं और हिंसा, लूटपाट तथा अठारह पापों में संलग्न रहते हैं, वे दुरात्मा कहलाते हैं। शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि दुरात्मा जितनी पीड़ा देता है, उतनी तो शत्रु भी नहीं देते।
दुरात्मा अपने कर्मों के कारण नरक और अन्य दुर्गति स्थानों में भ्रमण करता है। इसलिए हमें दुरात्मा बनने से बचना चाहिए। सभी को सदाचारपूर्ण जीवन जीना चाहिए और दुर्जनता से मुक्त रहना चाहिए। यदि किसी दुर्जन के पास विद्या होती है, तो वह उसे व्यर्थ विवाद में लगाता है, जबकि सज्जन व्यक्ति विद्या का उपयोग संवाद और ज्ञान के विकास के लिए करता है। यदि सज्जन के पास धन होता है, तो वह उसे दान कर समाज हित में लगाता है, जबकि दुर्जन धन का अहंकार करता है। दुर्जन के पास यदि शक्ति होती है, तो वह दूसरों को प्रताड़ित करता है, जबकि सज्जन अपनी शक्ति का उपयोग सेवा और रक्षा के लिए करता है। धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति सज्जनता से युक्त हो सकता है। धर्म दो प्रकार के होते हैं—उपासनात्मक और आचरणात्मक। व्यवहार में अहिंसा और सद्भावना बनाए रखनी चाहिए। उपासना के रूप में सामायिक, जप, त्याग आदि करना चाहिए।
गृहस्थ को भी धर्म का पालन करने का अधिकार है, लेकिन उसे अपने दायित्वों का निर्वाह करते हुए मोह और आसक्ति से बचना चाहिए। उसे सूखे मिट्टी के गोले की तरह अर्थात अनासक्त रहना चाहिए। सज्जन और दुर्जन के बीच अंतर केवल आचरण का होता है। जिसका स्वभाव बड़ा होता है, वही वास्तव में बड़ा व्यक्ति होता है। जिनका स्वभाव सहज रूप से दूसरों को अच्छा लगे, वे ही सच्चे सज्जन होते हैं। अणुव्रत आंदोलन सज्जनता को बढ़ावा देने का आंदोलन है। हमारी प्रवृत्ति वीतरागता की ओर होनी चाहिए।
साधु को विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए कि अशुभ योग उत्पन्न न हों। मोह-कर्म के प्रभाव से योग अशुभ हो सकते हैं। योगों में कषाय रूपी मल न मिल जाए, क्योंकि जब योग निर्मल होते हैं, तब निर्जरा संभव होती है। हमें अपनी आत्मा को उत्कृष्ट बनाना चाहिए और दुरात्मा बनने से बचना चाहिए। आचार्यश्री ने आगे कहा कि कच्छ की यात्रा के दौरान आज यहां मानव मंदिर में आना हुआ है। कई दिनों पहले से दिनेशचन्द्रजी महाराज का नाम सुन रहा था। आज आपसे मिलना हो गया। अच्छी साधना, धर्म-ध्यान आदि चलता रहे।
कार्यक्रम में स्थानकवासी आठ कोटि मोटी पक्ष के मुनि दिनेशचंद्रजी एवं अनेक साध्वियाँ पूज्यवर की सन्निधि में पहुँचीं। मुनि दिनेशचंद्र जी ने कहा कि हमें अपनी आत्मा को संयम और साधना के मार्ग पर आगे बढ़ाना चाहिए। आत्मा की उन्नति कर हम सिद्ध गति को प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने आचार्यश्री के स्वागत में कहा कि आज अपनी धवल सेना के साथ आचार्यश्री महाश्रमणजी का आगमन हुआ है। प्रेम, भावना और श्रद्धा भाव से आपका स्वागत करता हूं। आज आपने मानव मंदिर की धरा को धन्य कर दिया है। मंगल प्रवचन के उपरान्त आचार्य प्रवर के स्वागत में भावेन भाई संघवी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।