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इन्डियन योग एसोशियेशन राज्य समितियों का राष्ट्रीय सम्मेलन
इन्डियन योग एसोसिएशन का राष्ट्रीय अधिवेशन श्री श्री रविशंकर जी की अध्यक्षता में अणुव्रत भवन के सभागार में आयोजित हुआ। इस अवसर पर अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी की सुशिष्या डॉ. साध्वी कुन्दनरेखाजी, योग एसोसिएशन की अध्यक्ष डॉ. हंसा योगेन्द्र, डॉ. एच. आर. नागेन्द्र, डॉ. ईश्वर वासवारेड्डी सहित कई गणमान्य महानुभावों की उपस्थिति थी। अणुव्रत भवन आगमन पर अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास के प्रबन्ध न्यासी व योग एसोशियेशन के कोषाध्यक्ष के. सी. जैन ने सभी संत जनों व एसोसिएशन के पदाधिकारियों का स्वागत किया।
इस अवसर पर साध्वी कुन्दनरेखा जी ने कहा कि अणुव्रत आंदोलन आचार्य श्री तुलसी की अनुपम देन है। प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान वर्तमान तनाव भरे वातावरण के लिए संजीवनी है जिसके प्रणेता आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी रहे। वर्तमान में अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण भी पूरे देश में पदयात्रा कर जन-जन को नैतिकता, नशामक्ति व सद्भावना का संदेश दे रहे हैं। अध्यात्म विभूति आचार्य श्री महाश्रमण जी प्रेक्षाध्यान पद्धति की डोर थामे जन-जन की अंतर चेतना को जगाने हेतु प्रयासरत हैं।
साध्वी श्री ने श्री श्री रविशंकर से कहा कि यदि महातपस्वी आचार्य श्री महाश्रमण जी का इन्डियन योग एसोशियेशन की गवर्निंग बॉडी में स्थान हो तो यह केन्द्र और विश्व स्तर पर कार्य कर सकता है एवं गुरूदेव के कारण इसमें अनेकता में एकता का सूत्र स्थापित हो सकता है। श्री श्री ने कहा यदि ऐसा हो जाए तो हमारा बहुत बड़ा सौभाग्य होगा। आचार्य महाश्रमण एक विरल संत हैं। मां हंसा ने भी इस बात की अनुमोदना की।
कार्यक्रम में सर्व प्रथम योग एसोशियेशन की एक्जक्यूटिव काउंसिल की अध्यक्ष मां डॉ. हंसा योगेन्द्र जी ने सबका अभिवादन करते हुए कहा कि आज का यह कार्यक्रम बहुत ही ऐतिहासिक है। योग की सभी संस्थाओं का केन्द्रीय संगठन इंडियन योग एशोसियेशन आज व्यापक रूप से योग पर कार्य कर रहा है। इसका यह अधिवेशन जैन धर्म के अणुव्रत भवन में होना भी अपने आप में विशिष्ट है। पूज्य श्री श्री सहित सभी वरिष्ठ संत वृन्द की उपस्थिति में यह कार्यक्रम हो रहा है यह अपने आप में विरल है।
साध्वी डॉ. कुन्दनरेखा जी ने कहा कि आज का मंच वास्तव में सबको जोड़ने वाला है। अलग-अलग क्षेत्रों से पधारे इतने विद्वान संतों का इस अणुव्रत भवन में आगमन अद्भुत है। उन्होंने कहा कि वर्तमान तनाव भरे वातावरण में योग व ध्यान वह माध्यम से जिससे व्यक्ति शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक तनावों से मुक्त रह सकता है।
इस अवसर पर आर्ट ऑफ़ लिविंग के संस्थापक व इण्डियन योग एसोशियेशन के पूर्व अध्यक्ष श्री श्री रविशंकर जी ने कहा कि आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ ने आधुनिक शिक्षा प्रणाली संतुलित करने के लिए विज्ञान एवं अध्यात्म का समन्वित रूप प्रेक्षाध्यान प्रस्तुत किया। सन 1982 में जब आचार्य श्री तुलसी, युवाचार्य श्री महाप्रज्ञ जी अणुक्त भवन में थे, हम तब 24 वर्ष के थे, उस समय हमने एक सप्ताह यहां रहकर ध्यान का अभ्यास किया, अणुव्रत भवन से हमारी गहरी स्मृतियां है। आज इस भवन को और भव्य बना दिया गया है। यह अत्यन्त पवित्र स्थल है। यहां यह कार्यकम होना ही अपने आप में योग के महत्व को बढ़ाता है।
इस अवसर पर डॉ. एच. आर. नागेन्द्र ने कहा कि आज और व्यापक स्तर पर योग के कार्य को करना है। योग ही वसुधैव कुटुम्बकम् की परिकल्पना को साकार कर सकता है। उन्होंने इण्डियन योग एसोशियेशन की स्थापना, इसके इतिहास व इसके विकास और भविष्य की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। प्रबन्ध न्यासी के. सी. जैन ने अणुव्रत भवन में सभी का स्वागत करते हुए कहा कि आज अणुव्रत भवन में सभी संतों का आगमन हम सबके लिए सौभाग्य की बात है। उन्होंने जैन धर्म में योग व ध्यान के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार्य महाप्रज्ञ जी ने प्रेक्षाध्यान का आविष्कार कर मानवता के लिए बहुत बडा वरदान दिया।
कार्यक्रम का संचालन एक्जूक्यूटिव कांउसिल के जनरल सेकेट्री सुबोध तिवारी ने कुशलता पूर्वक किया। इस अवसर पर 22 राज्यों से पधारे एक्जक्यूटिव सदस्य, श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के अध्यक्ष सुखराज सेठिया, अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास के न्यासी शांति कुमार जैन, सुशील राखेचा, प्रमोद घोडावत, पी. सी. कपूर, डा. एस.पी. मिश्रा, डा. डी. आर. कार्तिकेयन, डा. राघवेन्द्र राव, प्रो. सरोज शर्मा सहित कई महानुभावों की सहभागिता रही। कार्यक्रम को सफल बनाने में इण्डियन योग संस्थान व अखिल भारतीय अणुव्रत न्यास के कार्यकर्ताओं की प्रमुख भूमिका रही।