
गुरुवाणी/ केन्द्र
अनित्यतता का चिंतन करने से क्षीण हो सकता है मोह : आचार्यश्री महाश्रमण
संयम सुमेरू आचार्यश्री महाश्रमणजी के गांधीधाम प्रवास के पंचम दिवस ‘जैनं जयतु शासनम्’ का कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिन शासन प्रभावक आचार्य श्री महाश्रमण जी ने अपनी पावन देशना में फरमाया कि जैन वाङ्मय में तीर्थंकरों का सर्वोपरि स्थान होता है। तीर्थंकरों की देशना सुनने का अवसर मिलना अत्यंत सौभाग्य की बात होती है। यदि उनकी वाणी को श्रद्धा और सम्मान के साथ सुना जाए, तो वह आत्मिक कल्याण का निमित्त बन सकती है। तीर्थंकर सदा और सर्वत्र उपलब्ध नहीं होते, लेकिन सौभाग्य से आगम साहित्य हमारे पास विद्यमान है।
आगम वाणी के आधार पर साधना-पथ प्रशस्त हो सकता है और जीवन को सही दिशा मिल सकती है। यदि हम आगम वचनों पर श्रद्धा रखें, तो वैराग्य-भाव दृढ़ हो सकता है। आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन अनित्य है। जैसे वृक्ष का पका हुआ पत्ता एक दिन टूटकर गिर जाता है, वैसे ही यह जीवन भी एक दिन समाप्त हो जाता है। इसलिए एक क्षण भी प्रमाद में नष्ट न करें। अनित्यता का चिंतन करने से मोह और आसक्ति कमजोर हो सकती है और व्यक्ति आध्यात्मिक जागृति की ओर बढ़ सकता है। गृहस्थ जीवन में धन, पद और प्रतिष्ठा का संयोग हो सकता है, लेकिन यह सब क्षणभंगुर है। जिस चीज़ का संयोग होता है, उसका कभी न कभी वियोग भी निश्चित होता है।
धन केवल इस जीवन तक साथ रहता है, परंतु त्याग और संयम जीवनभर व्यक्ति का सहचर बन सकता है। आचार्यश्री ने समझाया कि लक्ष्मी, प्राण, जीवन और जवानी— ये सब अत्यंत चंचल हैं। पुण्य के योग से व्यक्ति उच्च पद प्राप्त कर सकता है, लेकिन वह पद भी स्थायी नहीं होता। श्रावकत्व जीवनभर बना रह सकता है। यदि कोई अनित्यता पर विचार करे, तो उसका मोह भाव क्षीण हो सकता है और वह आत्माभिमुख बनने का प्रयास कर सकता है। जीवन का सत्य यह है कि मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ ही चला जाता है। इसलिए जीवन की सार्थकता इसी में है कि वह धर्म और अध्यात्म की साधना में प्रवृत्त हो।
आचार्यश्री ने बताया कि जैन धर्म में दो प्रमुख धाराएँ हैं— दिगंबर और श्वेतांबर। कालांतर में इनमें अनेक शाखाएँ विकसित हुईं। यद्यपि कुछ संदर्भों में मतभेद हो सकते हैं, परंतु अनेक संदर्भों में एकता भी विद्यमान है। 'जैनम् जयतु शासनम्'— यदि हमारे कार्य और साधना श्रेष्ठ हो, तो जैन शासन की कीर्ति चारों दिशाओं में फैलेगी। आचार्यश्री ने भक्तामर स्तोत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि यह प्रत्येक जैन परंपरा को मान्य है। इसका सतत स्वाध्याय सभी के लिए हितकारी है। नवकार महामंत्र को संपूर्ण जैन समाज में विशेष स्थान प्राप्त है, जो जैन एकता का प्रतीक भी है। इसी प्रकार, तत्वार्थसूत्र को भी सभी स्वीकार करते हैं।
यद्यपि आचार-सिद्धांतों में कुछ भिन्नताएँ हो सकती हैं, फिर भी मूलतः सभी परंपराएँ एक ही सिद्धांत को मानने वाली हैं। अनेकता में भी एकता का दर्शन किया जा सकता है। जैसे वृक्ष की अनेक शाखाएँ होती हैं, परंतु मूल एक ही होता है, वैसे ही जैन धर्म की विभिन्न धाराओं के मूल में एकता है। आचार्यश्री ने सभी को प्रेरित करते हुए कहा कि हमारी साधना उत्तम होनी चाहिए, हममें परस्पर मैत्री भाव बना रहना चाहिए। यदि हमारी साधना शुद्ध एवं निर्मल रहे, तो वह हमें आध्यात्मिक उन्नति के शिखर तक पहुँचा सकती है।
आचार्य प्रवर के मंगल प्रवचन से पूर्व मुनि राजकुमारजी ने सुमधुर गीत का संगान किया। ‘जैनं जयतु शासनम्’ कार्यक्रम के अंतर्गत मूर्तिपूजक जैन समाज-गांधीधाम के अध्यक्ष चंपालाल पारेख, अखिल कच्छ दिगम्बर जैन समाज-गांधीधाम के अध्यक्ष अश्विन जैन, स्थानकवासी छह कोटि जैन संघ-गांधीधाम के अध्यक्ष प्रदीप मेहता, अचलगच्छ जैन संघ के मंत्री जीतूभाई छेड़ा, स्थानीय तेरापंथी सभा के अध्यक्ष अशोक सिंघवी, पूर्व अध्यक्ष नरेन्द्रभाई संघवी, आठ कोटि मोटी पक्ष के अध्यक्ष रोहितभाई शाह, डेवलपमेंट कमिश्नर भानू जैन, ईस्ट कच्छ के पुलिस अधीक्षक सागर बाघमार, जेडीए के पूर्व चेयरमेन मधुकांत भाई शाह, इण्टरनेशनल महावीर जैन मिशन-यूके इंग्लैण्ड के अरविंद जैन ने आचार्यश्री के स्वागत में अपने उद्गार व्यक्त किए। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमार जी ने किया।