
गुरुवाणी/ केन्द्र
संस्कार निर्माण में अति महत्वपूर्ण है महिलाओं की भूमिका : आचार्यश्री महाश्रमण
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जनोद्धारक आचार्यश्री महाश्रमणजी ने प्रवचन देते हुए फरमाया कि आर्हत् वाङ्मय में श्रमण संघ का उल्लेख किया गया है। श्रमण संघ चतुर्वर्णी होता है— अर्थात् चार रूपों में विभक्त होता है। ये चार अंग हैं— साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका। आश्चर्य की बात यह है कि श्रावक-श्राविका को भी श्रमण संघ के अवयवों में सम्मिलित किया गया है।आचार्यश्री ने कहा कि अर्हत् अथवा तीर्थंकर तीर्थ की स्थापना करने वाले होते हैं। वे असीम कल्याणकारी कार्य करते हैं। वर्तमान में जंबूद्वीप के इस भाग में तीर्थंकरों की सन्निधि नहीं मानी जाती। भगवान महावीर इस अवसर्पिणी काल के भरत क्षेत्र के अंतिम तीर्थंकर हुए हैं। अब इस अवसर्पिणी काल में कोई नए तीर्थंकर प्राप्त नहीं होंगे। हालाँकि, हमें आगम प्राप्त हैं और आगमों में चतुर्विध धर्म संघ की चर्चा की गई है। साधु सर्वविरति धारी होते हैं, जबकि श्रावक देशविरति धारी होते हैं। साधु-साध्वियों की साधना में श्रावकों का विशेष योगदान रहता है। आगम में श्रावक-श्राविका को साधु-साध्वियों के माता-पिता के समान बताया गया है। श्राविका समाज धर्म और समाज सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
आज का विषय है— 'हमारी संस्कृति, हमारा परिवार।' संस्कृति का शिक्षण परिवार से भी प्राप्त हो सकता है। संस्कृति की सुरक्षा में साहित्य भी सहायक हो सकता है। संस्कार और संस्कृति— दोनों शब्दों में नैकट्य है। परिवार संस्कारों की पाठशाला होता है। संस्कारों को मजबूत करने में बहनों एवं माताओं का विशेष योगदान हो सकता है। बच्चों के लिए माता-पिता प्रथम शिक्षक होते हैं। वे उन्हें कैसे संस्कारित करें, यह महत्वपूर्ण है। बच्चे कोरे कागज की तरह होते हैं, लेकिन वे अपने पिछले जन्मों के संस्कार भी साथ लेकर आते हैं। उचित मार्गदर्शन और सही वातावरण मिलने पर संस्कार उजागर हो सकते हैं। अच्छे संस्कार गलत कार्यों से बचा सकते हैं। आत्मा में सद्गुण और संस्कार भरे होते हैं। जब क्षयोपशम होता है और क्षायिक भाव प्रकट होते हैं, तो भीतर के शुभ भाव तथा शुक्ललेश्या के भाव प्रबल हो सकते हैं।
आज 8 मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस है। दुनिया में पुरुषों का महत्त्व है तो महिलाओं की अपनी उपयोगिता और महत्ता हो सकती है। जिसकी जहां उपयोगिता होती है, यदि उसका सही उपयोग किया जाए तो समाज में सुगमता और प्रगति हो सकती है। हमारे धर्म संघ में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल कार्यरत है, जिसकी अनेक शाखाएँ हैं। यह संगठन ज्ञानवर्धक और आध्यात्मिक गतिविधियों का संचालन कर रहा है। इसके कारण कई महिलाओं को विकास के अवसर मिले हैं। महिला मण्डल है, कन्या मण्डल है, बेटी तेरापंथ की के नाम से भी एक उपक्रम चल रहा है।श्वेतांबर परंपरा में उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ को स्त्री माना गया है और साध्वी को भी मोक्षगामी माना गया है। जबकि दिगंबर परंपरा में यह मान्यता नहीं है। परंपराओं में भले ही मतभेद हो सकते हैं, लेकिन महिला आध्यात्मिक उन्नति कर सकती है। हमारे साध्वी समाज, समणी वर्ग और श्राविका समाज में भी निरंतर विकास हो रहा है। हमारा धार्मिक एवं आध्यात्मिक उत्थान होता रहे, और हम बच्चों को उत्तम संस्कार देते रहें।
महिलाओं की भूमिका संस्कार निर्माण में अति महत्वपूर्ण है। कई संतानें ऐसी होती हैं, जो इतने ऊँचे स्थान पर पहुँच जाती हैं कि उनकी माताएँ गौरवान्वित हो जाती हैं। आचार्यश्री ने कहा— मातुश्री वदनाजी को मैंने बचपन में देखा है। हमारे आचार्यों को भी बचपन में संस्कार देने का क्रम माताओं द्वारा बना है। हमारा परिवार संस्कारों का पारावार बना रहे, हमारी संस्कृति सुरक्षित रहे। परिवार, समाज, देश और संपूर्ण विश्व उन्नति करे। महिला समाज धार्मिक एवं आध्यात्मिक सेवा में आगे बढ़ता रहे, यही शुभेच्छा है। पूज्यप्रवर की सन्निधि में गांधीधाम की विधायक मालतीबेन माहेश्वरी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम के प्रारम्भ में तेरापंथ महिला मण्डल-गांधीधाम की बहनों ने गीत का संगान किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।