धर्म है उत्कृष्ट मंगल

स्वाध्याय

आचार्यश्री महाश्रमण

धर्म है उत्कृष्ट मंगल

पर्युषण पर्व के सात दिनों की सम्यग् आराधना के लिए कुछ बिन्दु श्रावक समाज को सुझाए जा रहे हैं, जिनका यथासम्भव यथोचित रूप से उपयोग किया जा सकता है
lप्रतिदिन कम से कम पांच सामायिक करना।
lप्रतिदिन कम से कम तीन घंटा मौन करना। उसके सिवा अनावश्यक भाषण से विरत रहना।
lप्रतिदिन कम से कम दो घंटा जप अथवा ध्यान करना।
lप्रतिदिन तीनों समय (प्रातः, मध्यान्ह व रात्रि में) प्रवचन-श्रवण अथवा उस समय धार्मिक ग्रन्थों का स्वाध्याय (कुल मिलाकर तीन घंटा) करना।
lप्रतिदिन दवा व पानी के अतिरिक्त नौ द्रव्यों से अधिक न खाना-पीना।
lप्रतिदिन प्रातः नमस्कारसंहिता (नौकारसी) का प्रत्याख्यान रखना। पौरुषी, एकाशन आदि भी क्षमतानुसार किए जा सकते हैं।
lप्रतिदिन रात्रि में चौविहार अथवा तिविहार (चारों आहारों का त्याग अथवा जल के अतिरिक्त सभी आहारों का त्याग) रखना।
lसचित्त खाने-पीने व जमीकन्द की सब्जी के भक्षण का त्याग रखना।
lब्रह्मचर्य की साधना करना।
lक्षमा की साधना, किंचित् भी कोधपूर्ण व्यवहार किसी के साथ न हो, ऐसा प्रयास रखना।
•lमृषावाद से विरत रहना।
•lसिनेमा न देखना, अन्य माध्यमों से भी फिल्म आदि न देखना।
lव्यापार आदि से विरत रहना, धार्मिक व्यापार चलाना।
•lअधिक समय धर्मस्थान में बीते, ऐसा यथासम्भव प्रयास करना।
lकिसी प्रकार के खेल व आमोद-प्रमोद के उत्सवों में भाग न लेना।
lसाधु-साध्वियां निकट हों तो उनके दर्शन कए बिना मुंह में पानी भी न लेना।
lसायंकाल स्वयं प्रतिक्रमण करना अथवा सामूहिक प्रतिक्रमण होता हो तो उसमें भाग लेना। ये दोनों ही सम्भव न हो सकें तो दिन भर में क्या किया, उसका निरीक्षण व आत्म-चिन्तन कम से कम २० मिनट करना।
lसात दिन सामूहिक रूप में नमस्कार महामन्त्र आदि का अखण्ड जप भी चलाया जा सकता है जिसमें समय विभाजन कर अनेकानेक व्यक्ति लाभ ले सकते हैं।
सामायिक का अनुष्ठान आध्यात्मिक पोषण का एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग है। इसमें स्थित व्यक्ति सांसारिक कार्य खान-पान आदि से मुक्त हो जाता है।
हिंसा, मृषा, चौर्य, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान आदि अठारह पापों से मुक्त हो एक मुहूर्त तक स्वाध्याय, जप आदि में निरत रहना महान् आत्मशोधन का कार्य है। इसमें संकल्प की दृढ़ता आवश्यक है। पर्युषण के दिनों में तो ज्यादा सामायिकें करनी चाहिए किन्तु कितना अच्छा हो हर श्रावक-श्राविका प्रतिदिन एक सामायिक तो लगभग अनिवार्यरूपेण करे। एक सामायिक दिन-रात के चौबीस घंटों की आध्यात्मिक खुराक प्रदान कर सकती है। सामायिक के दौरान तो व्यक्ति राग-द्वेष मुक्त रहता हुआ धर्मपरायण बनता ही है अथवा बनना चाहिए ही। परन्तु सामायिक के कालमान को पूर्णता के पश्चात् भी सामायिक कर्त्ता यथासम्भव साम्ययोग का सलक्ष्य प्रयास रखे तो जीवन धर्मप्रभावित बन सकता है। सामायिक व साम्ययोग के अभाव में पारिवारिक वैमनस्य और अशांति की स्थिति पैदा होती है।