
स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
धर्म और अधर्म आध्यात्मिक जगत् के प्रसिद्ध शब्द हैं। इनकी विवेचना में बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे गए हैं उनमें इनकी विभिन्न परिभाषाएं प्राप्त होती हैं। जैन आगमों में धर्म के बारे में विवेचन प्राप्त होता है। वहां एक जगह कहा गया है - 'समया धम्म मुदाहरे मुणी' मुनि (भगवान महावीर) ने समता को धर्म कहा है। समता ही धर्म की सशक्त कसौटी है। जहां राग-द्वेष नहीं हैं समतामय स्थिति है, समतामय प्रवृत्ति है, वहां धर्म है। साधनाकाल में यह समता की भूमिका धर्म है। अभ्यास के द्वारा समता को पुष्ट किया जा सकता है। यदि व्यक्ति का सही लक्ष्य और निरन्तर गतिशीलता हो तो लक्ष्य की प्राप्ति हो सकती है। समता की स्थिति को पुष्ट करने का एक माध्यम है सामायिक की साधना। श्रावक के बारह व्रतों में इसको नवां स्थान प्राप्त है। इसकी व्याख्या में श्रावक प्रतिक्रमण में लिखा गया है-
धर्म है समता, विषमता पाप का आधार है।
जैन शासन के निरूपण का यही बस सार है।।
त्याग कर सावद्य चर्या सुखद सामायिक करूं।
लीन अपने आप में हो मैं भवोदधि को तरूं ।।
एक सामायिक का कालमान एक मुहूर्त (४८ मिनट) है। इस काल में सामायिकस्थ श्रावक साधु जैसा बन जाता है। सामायिक में सावद्य योग का प्रत्याख्यान होता है। सावद्य शब्द स+अवद्य इन दो शब्दों के योग से निष्पन्न हुआ है। 'स' का अर्थ है सहित और अवद्य का अर्थ है-पाप। पाप सहित को सावद्य कहा जाता है। योग शब्द का अर्थ है-प्रवृत्ति। सामायिक में पाप सहित प्रवृत्ति संकल्प के द्वारा परित्यक्त की जाती है अथवा यों कहा जा सकता है कि सामायिक में अशुभ योग आश्रव का परित्याग किया जाता है। इस काल में श्रावक निम्न अठारह पापों का सेवन नहीं कर सकता। हिंसा, झूठ, चौर्य, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग और देष, कलह, अभ्याख्यान (दोषारोपण), पैशुन्य (चुगली), परपरिवाद (पर निन्दा), रति-अरति (असंयम के प्रति अनुराग और संयम से विराग), मायामृषा (माया युक्त झूठ का प्रयोग) और मिथ्यादर्शनशल्य।
जैन धर्म में त्याग प्रत्याख्यान के सम्बन्ध में करण और योग का विधान रहा है। करण और योग के आधार पर यह निश्चय किया जाता है कि अमुक त्याग किस सीमा तक किया गया है। करण तीन हैं (१) करना (२) करवाना (३) अनुमोदन करना। योग भी तीन हैं (१) मन (२) वचन (३) काय। तीन करण और तीन योग से नौ भंग बनते हैं- (१) करना नहीं मन से (२) करना नहीं वचन से (३) करना नहीं काय से (४) करवाना नहीं मन से (५) करवाना नहीं वचन से (६) करवाना नहीं काय से (७) अनुमोदन करना नहीं मन से (च) अनुमोदन करना नहीं वचन से (६) अनुमोदन करना नहीं काय से।
श्रावक के तीन प्रकार की सामायिक हो सकती हैं-
(१) छह कोटि की सामायिक– इसमें दो करण तीन योग से, सावद्य योग का प्रत्याख्यान किया जाता है। (करना नहीं मन से, वचन से, काय से, करवाना नहीं मन से, वचन से, काय से)
(२) आठ कोटि की सामायिक– इसमें दो करण और तीन योग के त्याग
तो पूर्ववत् हैं ही, अनुमोदन नहीं करना वचन से, काय से यह प्रत्याख्यान और हो जाता है।
(३) नौ कोटि की सामायिक– इसमें एक अवशेष भंग (अनुमोदन नहीं करना मन से) का प्रत्याख्यान और हो जाता है। साधारणतया छः कोटि की सामायिक का प्रत्याख्यान हमारे यहां प्रसिद्ध है। यह सारा सामायिक का निषेधात्मक पक्ष है। सामायिक का विधेयात्मक पक्ष यह है कि सामायिक में खाली नहीं बैठकर के स्वाध्याय, ध्यान, जप, प्रवचन श्रवण, तत्त्वचर्चा, धार्मिक उपदेश इनमें से किसी न किसी प्रवृत्ति का आलम्बन रखना चाहिए, उसमें संलग्न रहना चाहिए, ताकि मन को अशुद्ध भावों से सुगमता से बचाया या सके। सामायिक में श्रावक के लिए खान-पान, स्नान आदि प्रवृत्तियां बन्द हो जाती हैं। चतुर्विध आहार के सेवन से श्रावक मुक्त रहता है। सामायिक में व्यापार आदि से सम्बन्धित सावद्य बात-चीत भी नहीं की जा सकती है। व्यापार सम्बन्धी सावद्य चिन्तन और आर्थिक चिन्ता भी सामायिक में अकरणीय होती है।
विजयचन्दजी पटवा पाली के निवासी थे। वे एक बार दुकान से उठकर सामायिक करने के लिए स्वामीजी (आचार्य भिक्षु) की सेवा में गए। वे बहुधा व्याख्यान के समय दो सामायिक किया करते थे। प्रतिदिन के क्रम से उन्होंने ज्योंही सामायिक का प्रत्याख्यान किया, कुछ क्षण पश्चात् उन्हें याद आया कि दुकान पर जो दो हजार रुपये बाहर से आए थे, वह थैला दुकान बन्द करते समय अन्दर रखना भूल गया हूं। उन्होंने अपनी समस्या स्वामीजी के सम्मुख रखते हुए कहा-'आज तो सामायिक में आर्त्तध्यान का कारण उपस्थित हो गया।'