जीवन को समुन्नत बनाने और सुधारने का मूलाधार है सत्संग

संस्थाएं

जीवन को समुन्नत बनाने और सुधारने का मूलाधार है सत्संग

चंडीगढ़
हरियाणा राज्य के पूर्व सीएम भूपेंद्रसिंह हुड्डा से मुनि विनयकुमारजी आलोक ने शिष्टाचारक भेंट की। इस दौरान पूर्व सीएम हुड्डा ने मुनिश्री से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए कहा मनीषीसंत त्याग व संयम की मूर्त रूप हैं। इतनी लंबी आयु में भी मनीषीसंत के अंदर नौजवानों जैसी फूर्ति व कार्य के प्रति लगन देखते ही बनती है। मनीषीसंत के हर रोज अखबारों मे प्रवचन पढ़ने को मिलते हैं, वे लगातार आज की युवा पीढ़ी को ज्ञान की अलख लौ जगा रहे हैं।
मुनि विनयकुमारजी आलोक ने कहा कि जीवन को समुन्नत बनाने और सुधारने के लिए सत्संग मूलाधार है। जीवन के उद्देश्य की प्राप्ति में सत्संग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। सत्संग क्या है? इस संसार में तीन पदार्थ- ईश्वर, जीव और प्रकृति सत है। इन तीनों के बारे में जहां अच्छी तरह से बताया जाए, उसे सत्संग कहते हैं। श्रेष्ठ और सात्विक जनों का संग करना, उत्तम पुस्तकों का सत्संग, पवित्र और धार्मिक वातावरण का संग करना, यह सब सत्संग के अंतर्गत आता है। सत्संग हमारे जीवन के लिए उतना ही आवश्यक है, जितना कि शरीर के लिए भोजन। भोजनादि से हम शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति कर लेते हैं, किंतु आत्मा जो इस शरीर की मालिक है, उसकी संतुष्टि के लिए कुछ नहीं करते। 
जीवन में सत्संग का सर्वाधिक प्रभाव होता है, क्योंकि उससे आपके अन्तः और बाह्य व्यक्तित्व का संवर्धन होता है। सत्संग की अवधारणा है, जो लोग समाज को स्वस्थ दिशा में ले जाने में समर्थ हैं, उनके पास बैठकर 'जीने और जीने देने की कला' का ज्ञान ग्रहण करना। ऐसे जन प्रबुद्ध कहलाते हैं। सबसे पहले आप ऐसे लोगों की पहचान और परख कीजिए फिर विनम्र भाव से उनका सान्निध्य प्राप्त करने का प्रयास कीजिए। इससे स्वयं में गुणात्मक परिवर्तन पायेंगे। ऐसे प्रबुद्धजन आपको वर्तमान में जीने की सीख सिखाते हैं। मुनिश्री ने आगे कहा- आत्मा का भोजन सत्संग, स्वाध्याय और संध्या है। सत्संग जीवन को निर्मल और पवित्र बनाता है। यह मन के बुरे विचारों व पापों को दूर करता है। भतृहरि ने जो लिखा है, उसका आशय है कि श्सत्संगति मूर्खता को हर लेती है, वाणी में सत्यता का संचार करती है। दिशाओं में मान-सम्मान को बढ़ाती है, चित्ता में प्रसन्नता को उत्पन्न करती है और दिशाओं में यश को विकीर्ण करती है। वस्तुतः सत्संगति मनुष्य का हर तरह से कल्याण करती है। जैसे चासनी के मैल को साफ करने के लिए कुछ मात्रा में दूध डालते हैं, उसी तरह जीवन के दोषों को दूर करने के लिए सत्संग करते हैं। 
प्रातःकाल का भोजन सायंकाल तक और सायंकाल का भोजन रात्रि भर शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है। ऐसे ही सुबह किया हुआ सत्संग पूरे दिन हमें अधर्म और पाप से बचाए रखता है। सायंकाल का सत्संग हमें कुत्सित विचारों से बचाता है।
मुनिश्री अंत में फरमाया- मानव सत्संग से सुधरता है और कुसंग से बिगड़ता है। कहा भी गया है कि जैसा होगा संग वैसा चढ़ेगा रंग। सत्संग मानसिक समस्याओं की चिकित्सा है। जब मन में काम, क्रोध रूपी वासनाओं की आंधी उठे और ज्ञान रूपी दीपक बुझने लगे तो ऐसे में सत्संग औषधि का कार्य करता है। विद्वानों का मानना है कि सत्संग से विवेक जाग्रत होता है। विवेक के जाग्रत होने पर ही यह जाना जा सकता है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा? क्या नैतिक है और क्या अनैतिक? 'यदि आप ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनते, उनके मार्गदर्शन में चलते तो ऐसा कदम कभी नहीं उठाते। अगर राजा सत्संगी होगा तो प्रजा भी उसका अनुसरण करेगी और उन्नत होगी, जिससे राज्य में सुख-शांति और समृद्धि बढ़ेगी।'