ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से व्यक्ति साहित्यकार बन सकता है: आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से व्यक्ति साहित्यकार बन सकता है: आचार्यश्री महाश्रमण

आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार समारोह का आयोजन

 
नंदनवन-मुंबई, 27 जुलाई 2023
आज के मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के अंतर्गत जैन विश्व भारती द्वारा संचालित ‘आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार’ के संदर्भ में प्रेरणा पाथेय प्रदान कराते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने फरमाया कि हमारे जीवन में दो तत्व है- आत्मा और शरीर। आत्मा शाश्वत व शरीर अशाश्वत है। आत्मा में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन आदि गुण होते हैं। घाति कर्म हल्के पड़ने पर यह गुण प्रकट हो जाते हैं। साहित्य शब्द संसार का तत्व है। शब्द पुद्गल होते हुए भी सशक्त माध्यम है। शब्द अर्थ के संवाहक होते हैं। इसलिए हमारा शब्दकोष समृद्ध हो। व्याकरण का ज्ञान न हो तो व्यक्ति भाषा जगत में अंधा है। शब्द कोष न हो तो वह व्यक्ति बहरा है, साहित्य का जिसे ज्ञान नहीं है, वह पंगु है, जिसके पास तार्किक शक्ति नहीं है, वह आदमी मूक है। यह साहित्य जगत की भाषा है। ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से व्यक्ति साहित्यकार बन सकता है। शब्दों की दुनिया मंे रहने वाले शब्दातीत जीवन में जीने का प्रयास करंे। भीतर का ज्ञान अशब्द ही साधना से प्राप्त हो सकता है।
परम पूज्य आचार्य तुलसी व आचार्यश्री महाप्रज्ञजी का विराट साहित्य उपलब्ध है। उन्होंने जैन आगमों के संपादन के कार्य को आगे बढ़ाया था। जैन विश्व भारती ऐसे साहित्य को प्रकाशित करने में अपना सहयोग देती है, ज्ञान के प्रचार, प्रसार और प्रकाश का कार्य कर रही है। जो सारस्वत साधना के प्रति समर्पित हो जाता है, वह साहित्य जगत को कुछ दे सकता है। सुराणा परिवार में भी धर्म के संस्कार पुष्ट होते रहें। दोनों पुरस्कार प्राप्तकर्ताओं मंे भी ज्ञान का विकास होता रहे, वे अध्यात्म के क्षेत्र में भी विकास करते रहें।
अनुकम्पाशीलता का भाव सात- वेदनीय बंध का कारण है
मुख्य प्रवचन के अंतर्गत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने ज्ञान की ज्योति जलाते हुए फरमाया कि भगवती आगम के आठवें शतक में कर्मों का बंध किस कारण से होता है। वेदनीय कर्मों के संदर्भ में बताया गया कि सातवेदनीय एवं असातवेदनीय कर्म के बंध और उदय के मूल में अनुकंपा है।
  प्राणी दुःख भी पाता है और सुख भी पाता है। जिस आदमी का शरीर सक्षम हो, स्वस्थ हो, चाहे जो काम करवालो, इतनी अनुकूलता होेने का कारण सात वेदनीय कर्म के उदय का योग है। इसका कारण है कि उसके पीछे अनुकंपा-दया है। प्राण, भूत, जीव और सत्व के प्राणियों के प्रति अनुकंपा की भावना रखने वाला, उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं देने वाला, किसी की शांति को भंग नहीं करने वाला सातवेदनीय कर्म का बंध करता है। कुछ व्यक्तियों के छोटी उम्र में ही बिमारियां हो जाती है, कई शरीर से दुर्बल होते हैं। ये सब असातवेदनीय कर्म के उदय से होती है। इसका कारण है कि प्राण, भूत, जीव और सत्व की अनुकंपा न करना, शारीरिक परिताप देना। इरादतन किसी को दुःखी न करें। भले इस जीवन में बुरा काम न किया हो पर पिछले जीवन में जो किया है, उसका फल वर्तमान में भोगना पड़ सकता है। अनुकम्पाशीलता का भाव सातवेदनीय बंध का कारण है। निराकम्पाशीलता, निष्ठुरता का भाव असातवेदनीय कर्म के बंध का कारण है। अतः बिना कारण किसी प्राणी को कष्ट देने का प्रयास न करें। किसी भी प्राणी की शांति, सुविधा में बाधा नहीं डालना चाहिये। 
कालूयशोविलास की विवेचना कराते हुए महामनीषी ने उदयपुर में पूज्य कालूगणी के कर कमलों के द्वारा 15 वैरागी-वैरागण के दीक्षा महोत्सव के प्रसंग को विस्तार से बताया। धर्म की जय, पाप का क्षय होता है। 
साध्वीवर्याजी ने फरमाया कि आध्यात्मिक शक्ति पर जिसकी दृष्टि टिक जाती है, वह भौतिक सुखों की तरफ आकर्षित नहीं होता। भौतिक सुख अशास्वत है। इन्द्रिय विषयों से काम भोग की कामना हो सकती है। काम भोग की लोलुपता से प्राणी कामान्ध हो जाता है। हम आसक्ति से दूर रहंे। रोग-द्वेष की भावना विकृति पैदा करती है। काम की इच्छा मात्र करने वाला दुर्गति को प्राप्त हो सकता है। 
तपस्या के प्रत्याख्यान
पूज्यवर ने तपस्वियों को तपस्या के प्रत्याख्यान करवाये। रमेश गंुदेचा, भारती गुंदेचा ने सजोड़े़ व पुष्पा सोलंकी, किरण बड़ाला, सीमा खटेड़, सपना चपलोत, रमेश चपलोत, सुरेश राठौड, हीरा देवी संकलेचा, संतोष लोढ़ा, मीना छाजेड़, रेखा सांखला, सुनीता मेहता, रेखा मेहता व रंजना बड़ाला  ने तपस्या के प्रत्याख्यान लिए।
जैन विश्व भारती के मंत्री सलिल लोढ़ा ने पुरस्कार व पुरस्कार प्राप्त -कर्ताओं का परिचय दिया। वर्ष 2020 का आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार साहित्यकार डॉ नरेश शांडिल्य, दिल्ली एवं वर्ष 2021 का आचार्य महाप्रज्ञ साहित्य पुरस्कार डॉ हरीश नवल, दिल्ली को पूज्यवर की सन्निधि में जैन विश्व भारती द्वारा सूरजमल सुराणा चेरीटेबल ट्रस्ट, गुवाहाटी के प्रायोजकीय सहयोग से प्रदान किये गये। 
डॉ नरेश शांडिल्य एवं डॉ हरीश नवल ने पूज्यवर के प्रति कृतज्ञता के भाव एवं जैन विश्व भारती व प्रायोजक परिवार के प्रति धन्यवाद के भाव व्यक्त किये। प्रायोजक परिवार की ओर से सिद्धार्थ सुराणा ने पूज्यवर के प्रति कृतज्ञता के भाव प्रकट किये। कवि राजेश चेतन ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।