संबोधि

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बंध-मोक्षवाद
मिथ्या-सम्यग्-ज्ञान-मीमांसा
भगवान् प्राह
(38) हिंसासूतानि दुःखानि, भयवैरकराणि च।
पश्य-व्याहृतमीक्षस्व, मोहेनाऽपश्यदर्शन!
 
हिंसा से दुःख उत्पन्न होते हैं। वे भय और वैर की वृद्धि करते हैं। मोह के द्वारा अपश्य-दर्शन-अद्रष्टा बना हुआ पुरुष! तू पश्य-द्रष्टा की वाणी को देख।
हिंसा का अर्थ है-असत् प्रवृत्ति। वह मानसिक, वाचिक और कायिक-तीन प्रकार की होती है। जब आत्मा असत् प्रवृत्ति में प्रवृत्त होती है, तब अशुभ कर्म-बंध होता है और अशुभ कर्म सभी दुःखों के मूल हैं। अतः हिंसा सभी दुःखों की उत्पादक शक्ति है। इससे भय और वैर बढ़ते रहते हैं। अभय वह है जो अहिंसक है। अहिंसा वैर का उपशमन करती है।
 
(39) धर्मप्रज्ञापनं यो हि, व्यत्ययेनाध्यवस्यति।
हिंसया मन्यते शातिं, स जनो मूढ उच्यते।।
 
जो धर्म के निरूपण को विपरीत रूप से ग्रहण करता है और हिंसा से शांति होगी, समस्या का समाधान होगा, ऐसा मानता है, वह मनुष्य मूढ कहलाता है।
हिंसा से शांति नहीं, शस्त्रों का निर्माण होता है। अहिंसा की आत्मा को जानने वाला व्यक्ति ही हिंसा का नाश कर सकता है। हिंसा की आग कभी हिंसा से बुझ नहीं सकती। संभूम चक्रवर्ती ने ब्राह्मण से वैर लेने के लिए पृथ्वी को ब्राह्मण-हीन कर दिया तो परशुराम ने इक्कीस बार उसे क्षत्रियहीन बनाया। हिंसा प्रतिशोध को जन्म देती है। विवेकवान् व्यक्ति अहिंसा में शांति देखता है, आत्म-स्वभाव की समुपासना में धर्म को देखता है।
 
(40) असारे नाम संसारे, सारं सत्यं हि केवलम्।
तत्पश्यन्तो हि पश्यन्ति, न पश्यन्ति परे जनाः।।
 
इस सारहीन संसार में केवल सत्य ही सार है। जो द्रष्टा हैं, वे ही सत्य को देखते हैं। जो द्रष्टा नहीं हैं, वे सत्य को नहीं देख पाते।
भगवान ने कहा-‘सच्चं लोगम्मि सारभूयं-लोक में सत्य ही सारभूत है। सत्य क्या है? इसका उत्तर यही है कि जो वीतराग द्वारा कथित है, वही सत्य है। इसको समझना ही अपने आपको समझना है। जो व्यक्ति सत्य को देखता है वही आत्म-द्रष्टा हो सकता है। जो सत्य को नहीं देखता वह कुछ भी नहीं देखता।
सत्य विराट् है। सत्य भगवान् है। सत्य असीम है। इसको परिभाषा में बाँधना सहज-सरल नहीं है।
(क्रमशः)