अष्टम् आचार्य कालूगणी महाप्रयाण दिवस

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अष्टम् आचार्य कालूगणी महाप्रयाण दिवस

चंडीगढ़
मुनि विनयकुमारजी आलोक ने अणुव्रत भवन तुलसी सभागार में तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टम् आचार्यश्री कालूगणी के चरम कल्याणक दिवस पर सभा को संबोधित करते हुए फरमाया- ‘तेरापंथ के अष्टम् आचार्यश्री कालूगणी के शासनकाल को तेरापंथ का स्वर्णिम काल कहा जा सकता है। इस समय में तेरापंथ धर्मसंघ में शिक्षा, दीक्षा, साहित्य, साधना, कला आदि विभिन्न दिशाओं में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। आचार्य कालूगणी समय और संकल्प के महान धनी थे। अपने संकल्प को पूरा करने, तन में भयंकर वेदना के बावजूद मालव प्रदेश से विहार करके गंगापुर पधारे। आचार्य कालूगणी ने नारी जाग्रति के लिए अतुलनीय प्रयास किए। यहां के कण-कण में उनकी ऊर्जा जिंदा है। संघ को जो दिया वह कोई नहीं दे सकता। उन्होंने ही आचार्य तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ जैसे महान दार्शनिक संत की सौगात दुनिया को दी। जो जीवन को भर जी लेते हैं उनकी मौत नहीं होती। तेरापंथ जिन बुलंदियों पर है वह आचार्यश्री के कृर्तत्व की देन है।’
मुनिश्री ने आगे फरमाया कि कालूगणी के युग में भी संघ को भयंकर विरोधों का सामना करना पड़ा था, पर वे विरोध अग्नि में तपे हुए स्वर्ण की भांति संघ की गरिमा को और अधिक निखार देने वाले बने। कालूगणी बचपन से ही बहुत संस्कारी थे। धर्म के प्रति उनके मन में विशेष अनुराग था। माता की धार्मिक वृत्ति ने उनके अनुराग को और अधिक वृद्धिगंत किया। मघवागणी के वरद हस्त की छत्रछाया में मुनि कालू की साधना एवं अध्ययन प्रारंभ हुआ। बालक अवस्था में भी कालूगणी बड़े स्थिरयोगी थे। बुद्धि तीक्षण एवं प्रतिभा विलक्षण थी। मघवागणी की सन्निधि में रहने का उन्हें लगभग पांच वर्ष का अवसर प्राप्त हुआ। इस छोटी सी अवधि में उन्होंने अपने को बहुआयामी विकास दिया। मघवागणी के पश्चात लगभग साढ़े चार वर्ष तक माणकगणी तथा बारह वर्ष तक डालगणी का शासनकाल रहा। पूज्य कालूगणी मघवागणी की तरह माणकगणी एवं डालगणी के सामने पूर्ण सर्मपित व जागरूक बने रहे। उनकी अप्रमतता इतनी थी कि उन्हें कभी उल्लाहना के रूप में एक शब्द संभवतः सुनना नहीं पड़ा। माणकगणी के स्वर्गवास होने के पश्चात अन्तरिम शासन व्यवस्था को सुस्थिर बनाये रखने में कालूगणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। परिणामस्वरूप उन्हें अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति के संबंध में चिंतित होना नहीं पड़ा। कालूगणी के रूप में उनके सामने बना बनाया व्यक्तित्व था। उन्ही को उन्होंने अपना उत्तराधिकारी समर्पित कर दिया। कालूगणी के युग में जहां समण-समणी संपदा का अभूतपूर्व विस्तार हुआ, वहां तेरापंथ को विकास की विविध दिशाएं मिली। संघ का पुस्तक भंडार काफी समृद्ध हुआ।
मुनिश्री ने अंत में फरमाया कि कालूगणी के युग में तेरापंथ का क्षेत्र विस्तार भी बहुत हुआ। मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आदि सुदूर प्रान्तों में सर्वप्रथम उन्होंने ही साधुओं को भेजा। विद्या के क्षेत्र में विशेषकर संस्कृत विद्या के क्षेत्र में कालूगणी के समय में उल्लेखनीय प्रगति हुई। उन्होंने न केवल संघ में संस्कृत पाठकों को ही तैयार किया अपिुत भिक्षु शब्दानुशासनम् के रूप में संस्कृत व्याकरण को तैयार करवाकर संस्कृत विकास का एक द्वार खोल दिया। जब वे दिवंगत हुए तब एक सौ उनतालीस साधु और तीन सौ तैतीस साध्वियां संघ में विद्यमान थी।