जीवन में करें भगवती अहिंसा की आराधना : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

जीवन में करें भगवती अहिंसा की आराधना : आचार्यश्री महाश्रमण

अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस एवं अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह

नंदनवन, 2 अक्टूबर, 2023
अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस और अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अंतर्गत अहिंसा दिवस के अवसर पर अहिंसा यात्रा प्रवर्तक आचार्यश्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि आज का दिन महात्मा गांधी से संबंधित है। अहिंसा एक व्यापक तत्त्व है। अहिंसा भगवती सब जीवों के लिए क्षेमंकर-कल्याणकारी है। दुनिया का कौन सा धर्म है, जो अहिंसा को स्वीकार नहीं करता। अहिंसा के अनेक स्तर हो सकते हैं। एक साधु के जो अहिंसा के प्रावधान हैं, वह तो उच्च स्तर की अहिंसा है। गृहस्थ तो सामान्य स्तर पर अहिंसा का पालन करने वाला होता है। साधु के लिए महाव्रत और गृहस्थ के लिए अणुव्रत हो जाता है।
साधु को तो दया मूर्ति, अहिंसा मूर्ति होना चाहिए, उसके तो कण-कण में अहिंसा समाहित होती है। ऐसे साधु का दर्शन करने से ही आत्मा पवित्रता को प्राप्त कर लेती है। गृहस्थ जीवन में तो साधारणतया हिंसा हो जाती है। हिंसा के तीन प्रकार हो जाते हैंµ आरंभजा, प्रतिरोधजा और संकल्पजा हिंसा। आगम में कहा गया है कि शस्त्र का प्रयोग किसी भी जीव की हिंसा के लिए मत करो। बढ़िया है कि पूरे विश्व में निःशस्त्रीकरण हो जाए। सारे स्वानुशासित हो जाएँ। प्रशासन द्वारा कड़ाई भी शांति के लिए की जाती है। न्यायाधीश को तो अपराधी को सजा भी सुनानी पड़ सकती है। पर भावना हिंसा की न होकर सुधार की होनी चाहिए। आरंभजा और प्रतिरक्षात्मिकी हिंसा समाज में निंदनीय नहीं है।
संकल्पपूर्वक लोभ या आवेश के कारण होने वाली हिंसा गृहस्थ के लिए त्याज्य है, यह निंदनीय है, छोड़ने लायक हिंसा है। अणुव्रत आंदोलन तो मानव मात्र के कल्याण के लिए चलाया गया था। अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के कार्यक्रम तो विभिन्न वर्गों में चलने चाहिए। व्यापारिक स्थल, स्कूल-काॅलेज या जेलों में ये कार्यक्रम होने चाहिए। जैनों के लिए तो वैसे ही लगभग बारह व्रत स्वीकार किए होते हैं।
अणुव्रत का 75वाँ वर्ष चल रहा है। अहिंसा आदमी के भावों में और व्यवहार में रहे। छोटे-छोटे जीवों की हिंसा से बचें। किसी प्राणी को हमारे से कष्ट न पड़े। हमारी जीवनशैली में अहिंसा आ जाए। गृहस्थ मांसाहार का प्रयोग न करे। हम जीवन में अहिंसा भगवती की आराधना करें। अहिंसा शांति देने वाली होती है। ‘जय हे! जय जीवन दाता’ गीत का सुमधुर संगान करवाया। अहिंसा को आगम में भगवती नाम से उपमित किया गया है। गुरुदेव तुलसी जिन्होंने अनेकों यात्राएँ की थीं, उन्होंने अणुव्रत आंदोलन शुरू किया था। हम अणुव्रत के अनुरूप जीवन जीएँ। अणुव्रत समिति के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 रघुनाथ पांडे ने अपनी भावना अभिव्यक्त की। पूज्यप्रवर ने तपस्या के प्रत्याख्यान करवाए। कार्यक्रम का संचालन करते हुए मुनि दिनेश कुमार जी ने समझाया कि सम्यक् को पुष्ट रखने का प्रयास हो, उसे रूष्ट न होने दें।