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धर्म और व्यवहार का सेतु है अणुव्रत
मुनि जिनेशकुमारजी के सान्निध्य एवं अणुव्रत विश्वभारती सोसायटी के तत्वावधान में 77वां अणुव्रत स्थापना दिवस व्योम सोसायटी में अणुव्रत समिति कोलकाता-हावड़ा द्वारा आयोजित किया गया। इस अवसर पर उपस्थित जनसमुदाय को संबोधित करते हुए मुनिश्री ने कहा आचार्य श्री तुलसी त्रैकालिक दृष्टि सम्पन्न महापुरूष थे। उन्होंने अतीत का अनुसंधान किया, वर्तमान को समझने और भविष्य को अपनी दूर दृष्टि से पहचानने का प्रयास किया।
अणुव्रत उसी त्रैकालिक चिन्तन की फलश्रुति है। अणुव्रत मानवता, नैतिकता और अहिंसा तीनों का समन्वय है। अणुव्रत एक ऐसा असाम्प्रदायिक धर्म है जिसकी अपेक्षा और उपयोगिता शाश्वत है। अणुव्रत आन्दोलन जीवन की मूल भित्ति को सुदृढ बनाने का उपक्रम है। अणुव्रत धर्म और व्यवहार का सेतु है। अणुव्रत का अर्थ है-अपने से अपना अनुशासन। अणुव्रत आंदोलन का शुभारंभ 1 मार्च 1949 को आचार्य तुलसी के द्वारा हुआ था। यह दिन तेरापंथ के आठवें आचार्य श्री कालूगणी के जन्म दिन के रूप में स्थापित है। कालूगणी ने धर्मसंध में विद्या के विकास के लिए विशिष्ट प्रयत्न किये। 77 वें अणुव्रत स्थापना दिवस पर सभी अणुव्रत के संकल्पों को अपनाएँ।
कार्यक्रम का शुभारंभ अणुव्रत समिति कोलकाता, हावड़ा के कार्यकताओं द्वारा अणुव्रत गीत के संगान से हुआ। अणुविभा सोसायटी के ट्रस्टी रतन दुगड़ ने अणुव्रत आचार संहिता का वाचन करते हुए उन्हें स्वीकार करने की प्रेरणा प्रदान की। स्वागत वक्तव्य अणुव्रत समिति कोलकाता के अध्यक्ष प्रदीप सिंघी ने दिया। श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा बेहाला के अध्यक्ष अशोक सिंघी ने विचार व्यक्त किये। व्योम सोसाइटी की बहनों ने सामूहिक गीत प्रस्तुत किया। आभार ज्ञापन अणुव्रत समिति हावड़ा के अध्यक्ष दीपक नखत ने किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि परमानंद जी ने किया। इस अवसर पर अच्छी संख्या में श्रद्धालुगण उपस्थित रहे। कार्यक्रम से पूर्व अणुव्रत रैली का भी आयोजन किया गया।