
गुरुवाणी/ केन्द्र
अनेक पंथों में एकता का कारण है अहिंसा का सिद्धांत : आचार्यश्री महाश्रमण
तीर्थंकर के प्रतिनिधि अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में आज विभिन्न धर्म-संप्रदायों के श्रद्धालु उपस्थित हुए। ऋषि परंपरा के उज्ज्वल नक्षत्र आचार्य प्रवर ने मंगल प्रेरणाएं देते हुए कहा कि अहिंसा धर्म का मूल तत्व है। यद्यपि शब्द स्वयं जड़ होते हैं, किंतु वाणी के संवाहक होने के कारण उनका विशेष महत्व होता है। एक शब्द हमारे कानों में पड़ता है तो प्रसन्नता की अनुभूति होती है, जबकि कोई अन्य शब्द कष्टदायी अनुभव दे सकता है। पुद्गल भी हमारी भावनाओं को प्रभावित कर सकते हैं।
भारतीय सभ्यता धर्म, अध्यात्म और आत्मकल्याण से संबंधित है तथा अपने आप में अत्यंत श्रेष्ठ है। जहां सच्चाई, अच्छाई और गुणवत्ता की बात होती है, वहां सीमाओं से परे जाकर भी उसे स्वीकार करना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने के लिए छोटे बच्चे से भी प्रेरणा ली जा सकती है। भारत ऋषि-मुनियों की भूमि है, जहां प्राचीन काल से लेकर आज तक अनेक संत-महात्मा जन्म लेते रहे हैं। भारत में—विभिन्न भाषाएं बोली जाती हैं, अनेक धर्म-संप्रदाय एवं जातियां हैं। 'वसुधैव कुटुंबकम्' का सिद्धांत प्रचलित है, जो संपूर्ण धरती को एक परिवार मानता है। अहिंसा और मैत्रीभाव हमारी संस्कृति की विशेषता हैं। व्यक्ति को सबके प्रति सद्भावना और मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण रखना चाहिए। अहिंसा में सुख निहित है। अहिंसा, संयम और तप ही सच्चा धर्म है।
अहिंसा भगवती है, जो समस्त जीवों के कल्याण का कारण बनती है। सभी के प्रति अहिंसा और मैत्रीभाव बनाए रखना चाहिए। किसी भी जीव को हानि न पहुंचाने का संकल्प हमारे मन में दृढ़ रहना चाहिए। आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन द्वारा समाज में छोटे-छोटे व्रतों के माध्यम से नैतिक उत्थान का मार्ग दिखाया। आचार्य महाप्रज्ञजी ने प्रेक्षा ध्यान के द्वारा मानसिक और आत्मिक शुद्धि का मार्ग बताया। अध्यात्म के द्वारा संस्कारों का विकास संभव है।
भारत में असंख्य संत और पवित्र ग्रंथों की परंपरा रही है। विभिन्न धर्म-पंथों के माध्यम से सत्मार्ग का पथदर्शन प्राप्त होता है। प्राचीन संतों के पास विशेष ज्ञान हुआ करता था। भारत में चौबीस तीर्थंकरों का अवतरण हुआ है। भगवान महावीर और प्रभु श्रीराम जैसे दिव्य व्यक्तित्वों ने इस पावन धरा को गौरवान्वित किया। हमारी संस्कृति में अहिंसा, मैत्रीभाव और आध्यात्मिकता का समावेश है। अहिंसा सभी धर्मों में मान्य है, क्योंकि यह शांति का मार्ग है। यदि पूरी दुनिया में अच्छे संस्कार विकसित हो जाएं, तो संपूर्ण मानवता का कल्याण संभव है। प्राचीन ग्रंथों में मोक्ष का वर्णन मिलता है। धर्म का आचरण करने से मोक्ष की प्राप्ति संभव है। संन्यास की परंपरा भी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रही है।
जैन रामायण में उल्लेख है कि अयोध्या के कई राजाओं ने संन्यास ग्रहण किया था। राजा हिरण्यगर्भ ने अपने मस्तक पर एक श्वेत केश देखकर संन्यास का निर्णय लिया था। भारतीय सभ्यता में त्याग, संयम और तप का विशेष महत्व रहा है। कार्यक्रम में अनेक समाजों के महानुभावों ने अपने विचार व्यक्त किए— तेरापंथी सभा से बजरंग बोथरा, गोरखा समाज-कच्छ से विशाल धापा, जाट राजस्थान समाज से परसाराज चौधरी, उत्तर भारतीय समाज से हेमचंद्र यादव, आंध्र समाज गांधीधाम से श्रीनिवासन, विश्नोई समाज से हनुमान विश्नोई, बी.एस.एफ. के कमांडेंट विजयकुमार, आहीर समाज से नवीन भाई आदि। कार्यक्रम के संयोजक जितेंद्र सेठिया ने सभी का आभार व्यक्त किया।
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में भारत के अनेक क्षेत्रों और समाज के लोगों की विशेष उपस्थिति से ऐसा लग रहा था मानों राष्ट्रीय संत की सन्निधि में छोटा राष्ट्र ही उमड़ आया हो। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान करते हुए कहा कि आज विभिन्न व्यक्तियों की विशेष उपस्थिति लग रही है। सभी में एकता रहे। सभी में अहिंसा, सच्चाई, संयम जैसे सद्गुण रहे तो जीवन अच्छा हो सकता है। पूज्य सन्निधि में उपस्थित बोथरा परिवार को आचार्य प्रवर ने आध्यात्मिक संबल प्रदान किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।