परिग्रह में जो अटक गया, वह भटक गया : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

गांधीधाम। 13 मार्च, 2025

परिग्रह में जो अटक गया, वह भटक गया : आचार्यश्री महाश्रमण

फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी - चातुर्मासिक चतुर्दशी और होली का त्योहार—आज ही के दिन तीन वर्ष पूर्व शासनमाता साध्वीप्रमुखा श्री कनकप्रभाजी का दिल्ली में महाप्रयाण हुआ था। होली का लौकिक महत्व भी है—बुराई पर अच्छाई की विजय और भाईचारे का पर्व। जन-जन में सद्भावना और नैतिकता का जागरण कराने वाले आचार्यश्री महाश्रमणजी ने होली के पर्व पर आध्यात्मिक वाणी का रसास्वादन कराते हुए फरमाया कि शास्त्रों में साधुता का दर्शन कराया गया है। साधु पांच आश्रवों को पहचानकर छोड़ने वाला होता है। ये पांच हैं— हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन और परिग्रह। मूल पांच आश्रव बताए गए हैं— मिथ्यात्व, प्रमाद, अव्रत, कषाय, योग। ये पूर्ण रूप से केवल चतुर्दश गुणस्थान में ही छूट सकते हैं। हिंसा, झूठ आदि पांच आश्रवों का जो त्याग कर दे, वह सच्चा साधु होता है। साधु को मन, वचन और काय को संयमित और सुरक्षित रखना चाहिए। जो छः जीवनिकायों (पृथ्वी, अप्, अग्नि, वायु, वनस्पति और त्रस जीवों) का रक्षक है, वह अहिंसा मूर्ति होता है। साधु पांच इन्द्रियों का निग्रह करता है। निमित्त मिलने पर भी जिनका चित्त विकृत नहीं होता, वह धीर पुरुष होता है। ऐसे साधु निर्ग्रन्थ, ऋजुदर्शी और मोक्षदर्शी होते हैं।
संन्यास– परम सौभाग्य का द्वार
अनंत काल की यात्रा में साधुत्व प्राप्त होना परम सौभाग्य है। यह संन्यास जिसे मिल जाए, उसे संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि मिल जाती है। साधु परिग्रह में लिप्त नहीं होता, मोह-माया से विरक्त रहता है। वह चलता-फिरता तीर्थ होता है। साधु को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए—'क्या ये उपरोक्त गुण मुझमें हैं?' एक साधु का संक्षेप में चित्रण यह हो जाता है - पांच महाव्रत, तीन गुप्तियों का साधक, छः जीव निकाय के प्रति संयत, पांच इन्द्रियों का संयम, धीर, संयमदर्शी, ऋजुदर्शी और निर्ग्रंथदर्शी। परिग्रह में जो अटक गया, मानो किसी अंश में वह भटक गया। हमें इसमें अटकना, भटकना नहीं, अच्छी जगह पर केंद्रित रहना है।

यह हाजरी भी थोड़ी सी फेरने की सी चीज है। हम भी हाजरी के माध्यम से फेरने का काम करते हैं। हाजरी के माध्यम से साधु-साध्वियों को उनके नियमों के प्रति जागरूक किया जाता है। इससे साधुत्व पुष्ट बन सकता है। धर्मसंघ हमारा आश्रय है। हम संघ में रहकर साधना करते हैं। जहां भी अपने साधुत्व की शुद्धता के प्रति जागरूक रहने का प्रयास करना चाहिए। सर्व साधु-साध्वियां पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति की अखंड आराधना करे। यहाँ अखंड आराधना की बात है - बीच में शनिवार, रविवार या एक मिनट भी छुट्टी की बात नहीं है। साधुपन खंडित नहीं होना चाहिए। जिसकी जो जिम्मेवारी है, उसका ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण बात है। जिसकी जो ड्यूटी है, उसमें ब्यूटी रहे, उसके पालन में ब्यूटी रहे।
साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी– एक अप्रतिम व्यक्तित्व
तीन वर्ष पूर्व दिल्ली में साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी का अध्यात्म साधना केंद्र के अनुकंपा भावना परिसर में महाप्रयाण हुआ। वे लगभग 50 वर्षों से कुछ अधिक समय तक साध्वीप्रमुखा रहीं। आठ साध्वीप्रमुखाओं में सबसे अधिक लंबा काल साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी का रहा। उनके संरक्षण में अनेकों को साधना करने का अवसर मिला। गुरुदेव तुलसी मुनि अवस्था में लगभग 11 वर्षों तक रहे और साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी सामान्य साध्वी के रूप में करीब 11 वर्षों तक रहे। गुरुदेव तुलसी बिना कोई अगवानी बने सीधे युवाचार्य, आचार्य बने और साध्वीप्रमुखाजी भी बिना कोई अगवानी बने सीधे सामान्य साध्वी से असामान्य साध्वी बन गईं। यह उनके कर्मों का योग था, पुण्य का प्रभाव था। गुरुदेव तुलसी ने उन्हें साध्वीप्रमुखा के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने तीन आचार्यों की सेवा की और ज्ञान व साहित्य के क्षेत्र में विशेष योगदान दिया। उन्होंने खासकर साध्वी समुदाय को सेवा दी, अनेकों छोटे संतों को भी प्रेरणा दी। वर्तमान में साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी, साध्वीवर्याजी और मुख्य मुनि व्यवस्था संचालन में सक्रिय हैं। ये तीनों बहुश्रुत परिषद के सदस्य भी हैं।
संयम पर्याय के 50 वर्ष
पूज्यवर ने आगे फरमाया - दो साध्वियां, जिनके संयम जीवन के 50 वर्ष संपूर्ण होने वाले हैं— साध्वी ललिताश्रीजी (टमकोर) एवं साध्वी दीपमालाजी (श्रीगंगानगर) - दोनों साध्वियां आगम स्वाध्याय का प्रयास रखें। शरीर और स्वास्थ्य का भी ध्यान रखने का प्रयास और धर्मसंघ को जितना संभव हो सके, सेवा देने का प्रयास रखें। होली के शुभ अवसर पर पूज्यवर ने प्रेक्षाध्यान प्रयोग करवाया। आचार्यश्री की आज्ञा से मुनि चन्द्रप्रभजी और मुनि कैवल्यकुमारजी ने लेखपत्र का वाचन किया। आचार्यश्री ने मुनिद्वय को दो-दो कल्याणक बक्सीस किए। तदुपरान्त उपस्थित साधु-साध्वियों ने अपने-अपने स्थान पर खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया।
शासनमाता के महाप्रयाण दिवस पर वर्तमान साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने कहा—'दुनिया में कुछ लोग प्रतिभासंपन्न होते हैं और अपनी प्रतिभा का भरपूर उपयोग करते हैं। साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी उनमें से एक थीं। वे जब कला के रूप में थे, साध्वी कनकप्रभा के रूप में थे तब भी अपनी प्रतिभा का उपयोग करते थे। वे हमें फरमाते थे - 'अपनी प्रतिभा का उपयोग किया करो, बातों में समय व्यर्थ मत किया करो।' वे अपने समय के प्रति जागरूक थे, अध्ययन और अध्यापन में रुचि लेते थे। सृजनात्मक क्षेत्र में वे अनवरत आगे बढ़ रहे थे। कुशल प्रशासन वही कर सकता है जिसके मन में छोटों के प्रति वात्सल्य होता है, वृद्धों के प्रति करुणा होती है, और रुग्ण के प्रति करुणा के भाव होते हैं।'
'शासन गौरव' साध्वी कल्पलताजी द्वारा लिखित पुस्तक ‘सादर स्मरण शासनमाता’ का तीसरा भाग जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों द्वारा आचार्यप्रवर के सम्मुख लोकार्पित किया गया। इस संदर्भ में आचार्यश्री मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। साध्वीवृंद ने सामूहिक गीत का संगान किया। मारवाड़ जंक्शन के विधायक केशाराम चौधरी ने आचार्यश्री के दर्शन करने के उपरान्त अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।