सम्यकत्व प्राप्ति के बाद निश्चित है मोक्ष : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

गांधीधाम। 14 मार्च, 2025

सम्यकत्व प्राप्ति के बाद निश्चित है मोक्ष : आचार्यश्री महाश्रमण

अध्यात्म पुरुष आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपनी अमृत देशना में फरमाया कि हमारी दुनिया में आत्मा नामक तत्व है। आत्मा के अतिरिक्त शरीर, वाणी, मन, इन्द्रियां, पर्याप्ति और प्राण भी होते हैं। एक आत्मा की परिधि में अनेक तत्व समाहित होते हैं। जैन वाङ्मय में नव तत्वों में ‘आश्रव’ भी एक तत्व है। आश्रव संसार में भ्रमण का कारण है, जबकि संवर मोक्ष का कारण है। मोक्ष ही परम तत्व है और साधना की निष्पत्ति मोक्ष में होती है। मोक्ष आत्मा की सर्वकर्म मुक्त अवस्था है। यह परम अवस्था ही सिद्धत्व है। इसे प्राप्त करने का उपाय संवर और निर्जरा है।
गुरुदेव ने आगे फरमाया कि जीवन में एक बार भी संवर आ गया, सम्यकत्व आ गया तो फिर उसका मोक्ष निश्चित है। परंतु निर्जरा होने मात्र से मोक्ष मिले ही, यह आवश्यक नहीं। सिद्धांत की दृष्टि से देखे तो प्रथम गुणस्थान में मिथ्यात्वी के भी निर्जरा हो सकती है। मिथ्या दृष्टि के सकाम – अकाम दोनों तरह की निर्जरा हो सकती है। अभव्य जीव भी नौवें ग्रैवेयक तक स्वर्ग में उत्पन्न हो सकता है। आचार्यश्री ने फरमाया कि भौतिक आकांक्षाओं से रहित साधना होनी चाहिए। संवर और निर्जरा का निरंतर अभ्यास किया जाए।
संतों के लिए ये दोनों साधनाएं ही वास्तविक संपत्ति हैं। साधु तपोधन होते हैं, अतः उनकी तपस्या और साधना की संपत्ति बढ़नी चाहिए और सुरक्षित रहनी चाहिए। ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने पच्चीस बोल गुरुदेव के समक्ष प्रस्तुत किए एवं गीत की प्रस्तुति दी। तत्पश्चात पूज्य प्रवर ने बच्चों की कई जिज्ञासाओं को समाहित किया। अणुव्रत समिति गांधीधाम के अध्यक्ष अनंत सेठिया, आर्य समाज गांधीधाम के अध्यक्ष वाचोनिधि आचार्य, सभा के पूर्व अध्यक्ष पारसमल खांटेड़, हनुमानमल भंसाली, सोहनलाल बालड़, हीरालाल जी, ओसवाल समाज पचपदरा अध्यक्ष गौतम सालेचा ने अपने विचारों की प्रस्तुति दी। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।