साठ में से कम से कम दो घड़ी का समय धर्म के लिए करें समर्पित : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

गांधीधाम। 12 मार्च, 2025

साठ में से कम से कम दो घड़ी का समय धर्म के लिए करें समर्पित : आचार्यश्री महाश्रमण

तीर्थंकर के प्रतिनिधि आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आगम वाणी की अमृत वर्षा कराते हुए फरमाया कि मनुष्य जन्म लेता है और एक दिन अवसान को प्राप्त हो जाता है। वह अकेला आता है, कर्म करता है, अकेला चला जाता है और अकेला ही अपने कर्मों का फल भोगता है। अकेला ही अपने कर्मों का बंध करता है। यह एक नैसर्गिक सच्चाई है। यह एकत्व का भाव है कि 'मैं अकेला हूं।' आत्मा अकेली है, लेकिन मोह के कारण व्यक्ति यह मान लेता है कि 'यह मेरा है, वह मेरा है।' नैसर्गिक सच्चाई यह है कि 'मैं अकेला हूं और बाकी सब व्यवहार मात्र है।' यह मेरापन व्यक्ति को दुःख की ओर ले जा सकता है। एक साधु पुरुष सोचता है—"न कुछ तेरा, न कुछ मेरा, दुनिया रैन बसेरा।"
'मैं आत्मा हूं, मैं शरीर नहीं हूं।' जैसे सोना मिट्टी से मिला हो सकता है, परन्तु वह अलग रहता है, वैसे ही आत्मा और शरीर भिन्न हैं। यह अन्यत्व की चेतना एक भावना है। एक विचारधारा यह मानती है कि जीव ही शरीर है, जबकि दूसरी विचारधारा कहती है कि जीव और शरीर अलग-अलग हैं। ये आस्तिक और नास्तिक विचारधाराओं के सिद्धांत हैं। आत्मा स्वभाव से अमूर्त होती है, जबकि शरीर मूर्त होता है। आत्मा जब पापों से अपना अहित कर लेती है, तो वह स्वयं को उतना ही नुकसान पहुंचा सकती है जितना कोई अपने ही गले को काटकर कर सकता है। जब दुःख का उदय आता है, तब ज्ञाति-जन भी उस दुःख में भागीदार नहीं बन सकते। आत्मा अकेले ही अपने दुःख को भोगती है। कर्म बंधन करने वाला स्वयं ही उसका परिणाम भोगता है। व्यक्ति दूसरों के लिए भी पाप कर सकता है, लेकिन पाप के फल का भोग अकेले ही करना पड़ता है। परिवारजन संपत्ति में भागीदार हो सकते हैं, परन्तु दुःख में कोई साथी नहीं होता।
गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी पाप कर्म से बचें और सदाचार का जीवन अपनाएं। धन आगे साथ नहीं जाएगा, लेकिन धर्म आगे भी साथ रहेगा। इसलिए कहा गया है कि अट्ठावन घड़ी काम की, दो घड़ी राम की, अट्ठावन घड़ी कर्म की, दो घड़ी धर्म की, अट्ठावन घड़ी जीव, दो घड़ी शिव की। साठ घड़ी में से कम से कम दो घड़ी का समय धर्म के लिए अवश्य समर्पित करें। जीवन का व्यवहार अच्छा हो, दुकानदार ईमानदारी से कार्य करें। सामायिक का फल उत्तम होता है। हमें दूसरों की विशेषताओं को देखना चाहिए। निर्जरा और संवर पुण्य-पाप से भी उच्च कोटि की चीजें हैं। हमें पापाचार से बचने का निरंतर प्रयास करना चाहिए।
साध्वीवर्याश्री सम्बुद्धयशाजी ने कहा - महातपस्वी वह होता है जिसकी सहनशीलता अप्रतिम होती है। आचार्य प्रवर की सहनशीलता अद्वितीय है। उनकी देशना से सभी को जीवन जीने की कला प्राप्त हो रही है। हमें साधना की ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले सूत्र प्राप्त हो रहे हैं। ऐसे परम पुरुष के चरण जहां टिकते हैं, वह भूमि पावन हो जाती है। सौभाग्य से हमें ऐसे गुरु प्राप्त हुए हैं। पूज्यवर की सन्निधि में उपस्थित महानुभाव एडीशनल कमिश्नर जीएसटी विकास जोशी, रेलवे एरिया मैनेजर आशीष धानिया, राजस्थान महेश्वरी समाज के विवेक मिलाप, राजपूत राजस्थान समाज के मंत्री इंद्रजीत सिंह, बाबुलाल सिंघवी एवं अमर सिंह सिंघवी आदि महानुभावों ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त कीं।
कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।