
स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
एक द्विसदस्यीय परिवार में पति और पत्नी दो ही थे। किन्तु घर में कोलाहल इतना कि मानो वहां सौ आदमी रहते हैं। बात-बात में पति-पत्नी में झगड़ा हो जाता। दोनों जोर-जोर से एक-दूसरे को गालियां देते। पड़ोस में रहने वाले अन्य परिवार उन दोनों के झगड़ों से परेशान भी होते और उनका उपहास भी करते। पड़ोस में एक बूढ़ा आदमी भी रहता था। वह दोनों के पास गया और उनके बारे में पड़ोस में होने वाले वातावरण से उन्हें अवगत किया। दोनों लज्जित भी हुए। उपहास का पात्र उनका परिवार न बने, इसलिए उन दोनों ने एक-दूसरे से बिलकुल न बोलने का निश्चय किया। बोलना बन्द हुआ तो झगड़ा होना भी बन्द हो गया। भीतर ही भीतर भाव-परिवर्तन भी हुआ, झगड़े का स्थान पारस्परिक आत्मीयता ने ले लिया। परस्पर न बोलने पर भी वे एक-दूसरे के हितों की चिन्ता करने लगे। एक का सुख दूसरे का सुख और एक का दुःख दूसरे का दुःख प्रतीत होने लगा। सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए इस आत्मीय व सौहार्दपूर्ण संबंध की अपेक्षा रहती है।
एक बार की बात, पति कमरे में बैठा था। सर्दी का समय था। पास में जल रही लकड़ियों से वह ताप सेवन कर रहा था। ध्यान किसी अन्य कार्य में लगा हुआ था। अचानक थोड़ी-सी चिनगारी ने पति के लम्बे-चौड़े पायजामे को छू लिया। पति को इसका पता तक नहीं चला। कुछ दूर बैठी पत्नी ने इसे देख लिया। मन में चिन्ता हुई, किन्तु परस्पर बोलना तो बन्द था, निकट जाकर संकेत करना भी उसे उपयुक्त नहीं लगा। उसे एक तीसरा मार्ग सूझा। वह दीवाल की ओर मुंह कर एक पंक्ति दोहराने लगी- 'किसी को अला जले, किसी की बला जले और किसी का पायजामा जले।' यह पक्ति सुनते ही पति का ध्यानाकर्षण हुआ, वह संभल गया, पायजामे पर आगे बढ़ रही आग को उसने तत्काल बुझा दिया। फिर उसने सोचा-आज मेरी पत्नी ने मुझको बचाया है। ऐसी उपकारिणी पत्नी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन न करना तो अशिष्टता होगी। किन्तु समस्या वही कि उसे उससे बोलना नहीं था। उसने भी पत्नी का अनुकरण किया और दूसरी तरफ वाली दीवाल की ओर मुंह कर एक पक्ति बोल पड़ा 'लड़ती है, झगड़ती है, पर घर का ध्यान जरूर रखती है।' उसके बाद दोनों ने पुनः परस्पर बोलना शुरू कर दिया और सौहार्दपूर्ण पारस्परिकता बना ली।
पर्युषण पर्व मैत्री का संदेश लेकर आता है। वर्ष भर न खुलने वाली गांठें भी इस पवित्र अवसर पर खुल जानी चाहिए। संवत्सरी के उपवास की आग में वर्ष भर का वैमनस्य जला डालना चाहिए।
सामायिक का सार है समता भाव। प्रतिदिन सामायिक का प्रयोग किया जाए और व्यवहार में अक्रोध आदि का अभ्यास किया जाए तो महान् आध्यात्मिक पोषण जीवन को प्राप्त हो सकता है और ऐसा पोषण कि जिसका असर अगले जन्म में भी रह सकता है। कितना अच्छा हो कि पर्युषण पर्व से आध्यात्मिक सम्बल पा व्यक्ति पूरे वर्ष भर ऊर्जा प्राप्त करता रहे, अध्यात्म-प्रभावित आचरण उसके जीवन में दिखते रहें।
इसके लिए चार भावनाओं से चित्त को भावित करना अपेक्षित है। वे चार भावनाएं हैं मैत्री, प्रमोद, कारुण्य, माध्यस्थ्य।
मैत्री– दूसरों के हित का चिन्तन करना, सबके साथ मैत्री का भाव रखना।
प्रमोद– ईर्ष्या न रखना, दूसरों की उन्नति को देखकर जलन न करना, प्रसन्न होना।
कारुण्य– संक्लिष्ट अथवा दुःखित जीवों के प्रति करुणा का भाव रखना, उनके मंगल की कामना करना।
माध्यस्थ्य– प्रतिकूल आचरण करने वालों के प्रति मध्यस्थता तटस्थता का भाव रखना, उनके प्रति भी कोध या देष न करना।
इन चार भावनाओं का व्यवहार में प्रयोग करने वाला व्यक्ति धार्मिक कहलाने का अधिकारी है, ऐसा मेरा मन्तव्य है।
संवत्सरी के दिन अष्टप्रहरी पौषध हो सके तो वह किया जाए। चतुष्प्रहरी पौषध तो यथासम्भव किया ही जाए। इस दिन प्रवचन श्रवण व पूरे वर्ष का आत्मालोचन किया जाए। गत वर्ष में श्रावकाचार में कोई दोष लगा हो तो उसकी विशेष आलोचना की जाए। अपेक्षा हो तो प्रायश्चित किया जाए तथा अग्रिम संवत्सरी तक कोई त्याग-प्रत्याख्यान या संकल्प किया जाए। संवत्सरी के पारणे का दिन 'खमतखामणा' का दिन होता है। इस दिन अपने पारिवारिक जनों, संबंधियों व परिचितों से हार्दिक क्षमायाचना प्रायोगिक रूप में की जाए।
इस प्रकार धर्माराधना कर आत्मा को अध्यात्मभावित कर जीवन में उच्चता और गंभीरता प्राप्त करने का लक्ष्य बने। कहा भी गया है-
उच्चत्वमपरा नाद्रौ नेदं सिन्धौ गंभीरता।
अलंघनीयताहेतो द्वयमेतद् मनस्विनि।।
पर्वत में ऊंचाई होती है, पर गहराई नहीं होती। समुद्र में गहराई होती है, पर ऊंचाई नहीं होती। मनस्वी व्यक्ति में ऊंचाई और गहराई दोनों होती हैं।
ज्ञान की गहराई और आचरण की ऊंचाई को अर्जित करने की प्रेरणा इस महापर्व से सभी को प्राप्त हो।