
गुरुवाणी/ केन्द्र
स्वयं एवं दूसरों को बनायें अहिंसा पथ का पथिक : आचार्यश्री महाश्रमण
तीर्थंकरों के प्रतिनिधि, शांति के स्रोत आचार्यश्री महाश्रमणजी लगभग 12 किमी का विहार कर खारोई ग्रुप प्राथमिकशाला में पधारे। शांतिदूत ने फरमाया कि व्यक्ति के भीतर निष्ठुरता और आक्रोशशीलता हो सकती है, तो करुणा और क्षमाशीलता भी हो सकती है। दया, अनुकम्पा और मैत्री — ये अहिंसा के परिवार के सदस्य हैं। जिस व्यक्ति में दया-अनुकम्पा की भावना होती है, वह हिंसा के पाप से संभवतः बच सकता है और अन्य पापों से भी बच सकता है।
एक लोकोत्तर दया-अनुकम्पा होती है और दूसरी लौकिक दया। जहाँ आत्मा की रक्षा की बात आती है, वहाँ पाप कर्मों से आत्मा को रक्षित रखना लोकोत्तर दया है; और शरीर की रक्षा करना लौकिक दया कहलाती है। बाह्य संदर्भ में दया लौकिक होती है, जबकि आंतरिक व आध्यात्मिक संदर्भ में वह लोकोत्तर बन जाती है। साधु प्रवचन दे रहे हैं, यह लोकोत्तर दया है। वहीं, गरीब की सहायता करना लौकिक उपकार है। दान भी दो प्रकार का होता है — लोकोत्तर दान और लौकिक दान। संयमी साधु को विशुद्ध दान देना, सम्यक् ज्ञान देना, अभयदान देना — ये सब लोकोत्तर दान हैं। उपकार, दया और दान — इन कार्यों को हम लौकिक और लोकोत्तर रूप में देख सकते हैं। जो कार्य आत्मा के कल्याण से जुड़े होते हैं, वे सभी लोकोत्तर माने जाते हैं, जबकि बाह्य सहयोग लौकिक माना जाता है। यदि चित्त, वित्त और पात्र शुद्ध हो तो वह धर्म-दान कहलाता है। लौकिक दान से मित्रता बढ़ सकती है, शत्रुता कम हो सकती है; मान-सम्मान बढ़ाकर समस्याओं को दूर किया जा सकता है।
साधु दया के अधिकारी होते हैं, क्योंकि वे अहिंसा की मूर्ति होते हैं। वे जीवों की हिंसा से स्वयं को बचाते हैं। ऐसे साधु के दर्शन मात्र से ही कर्मों की निर्जरा होती है। गृहस्थ भी जितना संभव हो, अनावश्यक हिंसा से बचे। गृहस्थ जीवन में भी हिंसा होती है, जैसे चूल्हा जलाने से, चक्की/शिला से, झाड़ू से, ऊंखली-मूसल से और पानी भरने के स्थान से। यदि गृहस्थ इन कार्यों में सावधानी बरतें तो हिंसा का अल्पीकरण संभव है। किसी का लोकोत्तर उपकार करें, आध्यात्मिक उपकार करें, किसी को समझाकर सम्यक्त्वी बनाएं। साधु का जीवन लोकोत्तर दया का साकार रूप हो सकता है। उनके व्याख्यान के माध्यम से त्याग भी संभव हो सकता है। श्रावक भी लोकोत्तर उपकार कर सकता है। अहिंसा के परिवार से जुड़ें रहें, स्वयं अहिंसा के मार्ग पर चलें और दूसरों को भी उस मार्ग पर चलाने का प्रयास करें। धर्म-ध्यान की साधना जीवन में सतत चलती रहनी चाहिए। पूज्यवर के स्वागत में बागड़ सर्वोदय ट्रस्ट के ट्रस्टी मोतीलालभाई नंदु तथा खारोई प्राथमिक शाला से मुकेशभाई चावड़ा ने अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।