समता से उत्पन्न होने वाली प्रसन्नता है स्थायी : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

पडाना। 20 मार्च, 2025

समता से उत्पन्न होने वाली प्रसन्नता है स्थायी : आचार्यश्री महाश्रमण

महान यायावर आचार्यश्री महाश्रमणजी गांधीधाम के पंद्रह दिवसीय प्रवास के समापन के पश्चात शहर के बाहरी क्षेत्र में स्थित पाइन इंडिया परिसर में पधारे।मंगल प्रवचन में आचार्यप्रवर ने कहा कि जैन दर्शन, जैनिज्म और जैन धर्म ऐसे सिद्धांतों पर आधारित हैं जहाँ नौ तत्वों, अहिंसा और विशेष रूप से समता की चर्चा होती है। अध्यात्म की साधना का कोई प्रमुख आधार है, तो वह समता की साधना ही है। परिस्थितिजन्य खुशी क्षणिक होती है, जो कभी भी समाप्त हो सकती है, किंतु जो प्रसन्नता परिस्थिति-निरपेक्ष, आत्मा और समता से उत्पन्न होने वाली है, वही स्थायी सुख का कारण बनती है। समता हमारे नियंत्रण में होती है, जबकि परिस्थितियाँ हमारे वश में नहीं होतीं। जो स्ववश है, वही सुख का आधार है, और जो परवश है, वह दु:ख का कारण बनता है।
आचार्य प्रवर ने उदाहरण देते हुए कहा कि हमें भारुंड पक्षी की तरह सजग और अप्रमत्त रहना चाहिए। जीवन में द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव—इन सभी का विचार आवश्यक है। शरीर की सक्षमता भी एक प्रकार का सुख है। हमारे दो हाथ और दो पैर हमारे सेवक हैं, जिनका हमें उत्तम उपयोग करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में भी परावलंबी नहीं बनना चाहिए। परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, हमें उसमें समता का भाव बनाए रखना चाहिए।
आचार्यश्री ने समझाया कि अध्यात्म की साधना में समता बनाए रखना हमारे हाथ में है। हमें भौतिक पदार्थों के वशीभूत नहीं होना चाहिए, बल्कि विषमता से बचकर समता में स्थित रहने का प्रयास करना चाहिए। समता की साधना के माध्यम से आत्मा विशेष प्रसन्न होती है। यह आनंद बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि स्वयं के प्रयास से उपार्जित होता है। जो हमारा है, वह सदैव हमारा रहेगा, और जो पराया है, वह पराया ही रहेगा। भगवान महावीर ने भी समता की अद्भुत साधना की थी। पूज्य आचार्य श्री भिक्षु और गुरुदेव श्री तुलसी को जीवन में अनेक विरोधों का सामना करना पड़ा, परंतु उन्होंने अपने भीतर की शांति और समता को बनाए रखा। आलोचना का उत्तर शब्दों से नहीं, बल्कि श्रेष्ठ कर्मों से देना चाहिए। धैर्य और समता के साथ ही किसी भी परिस्थिति का समाधान संभव है।
उन्होंने आगे कहा कि समता ही सच्चा धर्म है। चाहे परिस्थितियाँ अनुकूल हों या प्रतिकूल, समता बनाए रखनी चाहिए। जैसे सूर्य अपने उदय और अस्त दोनों काल में लालिमा को नहीं छोड़ता, वैसे ही महान आत्माएं हर परिस्थिति में समता में स्थित रहती हैं। हमें भी समता की आराधना कर अपनी आत्मा को विशेष प्रसन्न बनाना चाहिए। साध्वीप्रमुखाश्री जी ने अपने उद्बोधन में भारतीय ऋषि परंपरा में संतों के चरणों के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भक्तामर स्तोत्र और कल्याण मंदिर स्तोत्र जैसे ग्रंथों में भी तीर्थंकरों के चरणों को सबसे पहले प्रणाम किया गया है। गुरु के चरणों के स्पर्श से उनकी आध्यात्मिक ऊर्जा हमें प्राप्त होती है। गुरु ऊर्जा के अखंड स्रोत होते हैं, और वे व्यक्ति धन्य होते हैं जिन्हें गुरु की कृपा दृष्टि और आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूज्यवर के स्वागत में सुराणा परिवार से कमल सुराणा और बहनों ने भक्ति गीत प्रस्तुत किए। सिद्धार्थ सुराणा ने अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। वाव क्षेत्र से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूज्यवर के दर्शनार्थ उपस्थित हुए। रूपल बेन ने अपनी भावना प्रकट करते हुए 'आराध्यम स्वागत गीत' का लोकार्पण किया। संयोजक विनीतभाई संघवी ने पूज्यवर को आमंत्रण पत्रिका भेंट की, जिसके उपरांत पूज्यवर ने आशीर्वचन प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।