
गुरुवाणी/ केन्द्र
किए गए कर्मों के फल से बचना है असंभव : आचार्यश्री महाश्रमण
महान यायावर आचार्यश्री महाश्रमणजी प्रातः लगभग 10 किलोमीटर का विहार कर नानी चिराई के शक्ति विद्यालय पधारे। मंगल देशना प्रदान करते हुए परम पूज्य ने फरमाया कि कर्मवाद का सिद्धांत न केवल जैन दर्शन में पाया जाता है, बल्कि अन्य दर्शनों में भी इसका उल्लेख है। कर्मवाद का संक्षिप्त सार यही है— "जैसी करणी, वैसी भरणी" अर्थात् जैसा किया जाता है, वैसा ही फल प्राप्त होता है। शास्त्रों में कहा गया है कि प्राणी को इस लोक और परलोक में अपने किए हुए कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता है। किए गए कर्मों के फल से बचना असंभव है। एक बुरे व्यक्ति में भी कुछ अच्छे गुण हो सकते हैं। इसी प्रकार, बुरे कर्म करने वालों का भी अपना पुण्य हो सकता है, जिससे उन्हें अपने कार्यों में सफलता मिल सकती है। किंतु यदि दुर्भाग्य प्रबल हो, तो असफलता भी हाथ लग सकती है।
मनुष्य अपने ही कर्मों के कारण कष्ट भोगता है। जो भी कर्म किए जाते हैं, उनके फल को भोगना ही पड़ता है। मनुष्य हंसते हुए कर्मों का बंधन करता है, लेकिन रोते हुए भी उनसे मुक्त नहीं हो पाता। कर्म अपना फल अवश्य देते हैं। इसलिए, अज्ञानतावश किए गए पाप कर्मों का बंधन अधिक कष्टकारी हो सकता है। व्यक्ति को अहिंसा और नैतिकता के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए और बेईमानी से बचना चाहिए। जीवन में धर्म की साधना और आराधना जितना संभव हो, उतना करना चाहिए। इस मानव जीवन का उपयोग, अप्राप्त को प्राप्त करने के लिए किया जाना चाहिए।
इस संसार रूपी सागर में हमारा जीवन निरंतर भ्रमण कर रहा है। यदि कोई डूबता हुआ व्यक्ति पास से गुजरती नौका में बैठने के बजाय पत्थर पकड़ने का प्रयास करे, तो वह और अधिक डूब जाएगा। इसी प्रकार, यदि मनुष्य जन्म प्राप्त करने के बावजूद धर्म का पालन न करे और विषय-सुख तथा तृष्णा में आसक्त हो जाए, तो वह अपने जीवन का सदुपयोग नहीं कर रहा। धर्म को विपत्ति और आपत्ति में भी नहीं छोड़ना चाहिए, चाहे धन चला जाए। हमारी निष्ठा ऐसी होनी चाहिए कि— "प्राणों की परवाह नहीं है, प्रण को अटल निभाएंगे।" साधु ने जो संकल्प लिया है, वह नहीं छूटना चाहिए। गृहस्थों को भी अपने नियमों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए, चाहे प्राण भी चले जाएं। इस प्रकार, मानव जीवन का सर्वोत्तम उपयोग कर, धर्म की साधना करनी चाहिए।