
गुरुवाणी/ केन्द्र
सुकुमारता को छोड़कर करें श्रम और सेवा : आचार्यश्री महाश्रमण
महामनस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी लगभग 11 किमी का विहार कर अपनी धवल सेना के साथ कुंजीसर पधारे। पावन प्रेरणा पाथेय प्रदान कराते हुए परम पावन ने फरमाया कि सुखी बनने के संदर्भ में कुछ सूत्र शास्त्र में बताये गये हैं। सुख व्यक्ति को इष्ट होता है और सुख पाने के लिए आदमी प्रयास भी करता है। शास्त्राकार ने सुखी बनने के संदर्भ में एक आध्यात्मिक समूह बताया है। पहली बात बताई है कि अपने आप को तपाओ - सुकुमारता को छोड़ो। कठोर जीवन जीने का प्रयास करो। कठोरता का अभ्यास नहीं है, सुविधावादी मनोवृति अवांछित स्तर पर है तो व्यक्ति दुःखी बन सकता है। व्यक्ति सर्दी, गर्मी और वर्षा को सहन करने का प्रयास करे। चारित्रात्माएं चलते हैं, यह भी कठोरता है, एक प्रकार की तपस्या हो जाती है। गर्मी में प्यास को सह लेना भी एक तपस्या है। वर्षा की अपनी समस्या हो सकती है। ठिठुरती सर्दी में भी चारित्र आत्माएं विहार कर देते हैं। यह भी एक कठोरता है। हर ऋतु का अपना महत्व है। हमें समता में रहते हुए कठोर स्थिति का भी सामना करना चाहिये। बड़ों की डांट को भी शांति से झेलना चाहिये। इससे भी कठोरता का अभ्यास हो जाता है। गुरु कड़ाई से कहकर अच्छी शिक्षा दे रहे हैं तो उसे भी समता से सहना चाहिये। शारीरिक कठिनाई और मानसिक कठिनाई को शांति से सहना चाहिये। सहन करो, सुखी बनो। श्रम करो, सफल बनो, सुखी बनो। व्यक्ति अवांछनीय कामनाओं को काम करने का प्रयास करे। छोटी चीजों में उलझने से बड़ी चीज प्राप्त नहीं हो सकती। कामना अतिक्रान्त हो जायेगी तो दुःख भी कम हो जायेगा, राग-द्वेष को छोड़ दे तो व्यक्ति संसार में सुखी रह सकता है। व्यक्ति कठोरता, श्रम और सेवा से अपने जीवन को सुखी बनाए। अपने प्रांगण में पूज्यप्रवर के स्वागत में राधाभाई अहीर ने उद्गार व्यक्त किये।