संबोधि

स्वाध्याय

-आचार्यश्री महाप्रज्ञ

संबोधि

एक दिन वह भगवान् महावीर के पास आया। वंदना की और बोला- 'भगवन्! मैं आपकी आज्ञा पाकर पांच सौ निग्रंथों के साथ जनपद विहार करना चाहता हूं। भगवान् ने सुना और मौन रहे। जमालि ने दूसरी बार, तीसरी बार अपनी भावना प्रकट की, किंतु भगवान् मौन रहे। वह वंदना नमस्कार कर पांच सौ निग्रंथों को ले अलग यात्रा पर निकल पड़ा।
श्रावस्ती के कोष्ठक चैत्य में ठहरा हुआ था। संयम और तप की साधना चल रही थी। कठिन तप के कारण उसका शरीर रोग से घिर गया। शरीर जलने लगा। वेदना से पीड़ित जमालि ने साधुओं से बिछौना करने के लिए कहा। साधु बिछौना करने लगे। कष्ट से एक-एक क्षण भारी हो रहा था। पूछा-बिछौना बिछा दिया या बिछा रहे हो? श्रमणों ने कहा-किया नहीं, किया जा रहा है। दूसरी बार कहने पर भी यही उत्तर मिला। जमालि इस उत्तर से चौंक उठा। आगमिक आस्था हिल उठी। वह सोचने लगा-भगवान् का सिद्धांत इसके विपरीत है। वे कहते हैं-क्रियमाणकृत और संस्तीर्णमाण संसृत करना शुरू हुआ, वह कर लिया गया, बिछाना शुरू किया वह बिछा लिया गया-यह सिद्धांत गलत है। कार्य पूर्ण होने पर ही उसे पूर्ण कहना यथार्थ हैं। उसने साधुओं को बुलाया और मानसिक चिंतन कह सुनाया। कुछ एक श्रमणों को यह विचार ठीक लगा और कुछ एक को नहीं। जमालि पर जिनकी श्रद्धा थी वे जमालि के साथ रहे। मिथ्या आग्रह से वह आग्रही हो गया। दूसरों को भी उस मार्ग पर लाने का वह प्रयत्न करता रहा। अनेक लोग उसके वाग्जाल से प्रभावित होकर सत्य मार्ग से च्युत हो गए।
४८. मिथ्यावर्शनमापन्नाः, सनिदानाश्च हिंसकाः।
म्रियते प्राणिनस्तेषां, बोधिर्भवति दुर्लभा।।
जो मिथ्यादर्शन से युक्त हैं, जो भौतिक सुख की प्राप्ति का
संकल्प करते हैं और जो हिंसक हैं, उन्हें मृत्यु के बाद भी बोधि की प्राप्ति दुर्लभ होती है।