नियति के योग के साथ व्यक्ति का पुरूषार्थ भी  काम करता है: आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

नियति के योग के साथ व्यक्ति का पुरूषार्थ भी  काम करता है: आचार्यश्री महाश्रमण

तेरापंथ सरताज की सन्निधि में आयोजित हुआ 264वां तेरापंथ स्थापना दिवस

 
दिनांक 03 जुलाई 2023, नन्दनवन
आषाढ़ी पूर्णिमा, तेरापंथ धर्मसंघ का 264वां स्थापना दिवस। तेरापंथ के एकादशम अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगल देशना प्रदान कराते हुए फरमाया कि आगम में श्रद्धा और आस्था के बारे में बताया गया है। श्रद्धा अच्छी हो तो श्रद्धेय भी अच्छा हो, यह अपेक्षित है। श्रद्धेय और श्रद्धा आस्थेय और आस्था इन दोनों का गहरा संबंध है। आस्थेय में कुछ सत्व, तत्व और अर्हता है, तभी तो एक बुद्धिमान व्यक्ति के मन में उसके प्रति आस्था, श्रद्धा का भाव प्रकट हो सकता है। वह सत्य है, वही सत्य ही है, जो जिनों ने कहा है, यह बात आस्था से जुड़ी हुई है। बीज के भीतर वृक्ष का सार भरा हुआ है। वृक्ष दिखाई देता है, बीज दिखाई नहीं देता, पर बीज उस वृक्ष की नींव का आधार है। आदमी पीछे से क्या लेकर आया है, वह हर किसी को प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता। जो क्षयोपशम का भाव है, वह मानों आदमी पीछे से लेकर आता है। आचार्य भिक्षु ने केलवा में जो दीक्षा ली थी, वह तेरापंथ का बीज थी। तेरापंथ स्थापना दिवस का आयोजन वृक्ष के रूप में है। 
तेरापंथ की स्थापना को 263 वर्ष हो गए। नियति के योग के साथ व्यक्ति का पुरुषार्थ भी काम करता है। एक धर्मसंघ का जन्म हुआ और नियति के योग के साथ इसमें विस्तार होता गया। विकास के लिए अभी भी अवकाश है। मुमुक्षु संख्या वृद्धि इसका आधार हो सकता है। आचार्य भिक्षु को बहुत सहन करना पड़ा होगा। आचार्य भिक्षु में भी सत्व था। वे आगे बढ़ते गए। तेरापंथ के सामने विरोधों की तो परम्परा सी चली थी। आचार्य तुलसी तक विरोध चला था, लेकिन आचार्यों के सत्व और दृढ़ आस्था से विरोध समाप्त होते गये। 
आचार्य प्रवर ने साधु-साध्वियों को प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि साधु-साध्वियों को तेरापंथ को समझने के लिए तेरापंथ के दर्शन को भी समझने का प्रयास करना चाहिये। साधु-साध्वियों को तेरापंथ के इतिहास का ज्ञान हो, तेरापंथ की मर्यादा और व्यस्थाओं का भी ज्ञान हो। इन्हें जितनी गहराई से समझने का प्रयास होगा, उतना ही अधिक विकास भी हो सकता है। तेरापंथ की गरिमा को बढ़ाने का प्रयास होना चाहिये।  
तेरापंथ स्थापना दिवस हमारे लिए प्रेरणा का निमित्त बने। संख्या का महत्त्व है तो मौलिकता और गुणवत्ता का भी महत्त्व है। हमारे धर्मसंघ के विकास में आचार्यों को साध्वीप्रमुखा व साधु-साध्वियों का सहयोग मिलता है। संगठन के विकास में श्रावक-श्राविकाएं भी सहयोगी बने हैं। हम धर्मसंघ के धार्मिक-आध्यात्मिक विकास में अपना जितना योगदान दे सकें, वह अच्छी बात हो सकती है। इस धर्मसंघ को ऊंचाई पर ले जाने में हमारे कंधे जितने काम आ सकें, देने का प्रयास करें। हम चातुर्मास में अच्छी साधना, अच्छा विकास करें। 
आचार्य प्रवर ने ‘शासन कल्पतरू’ गीत के कुछ पद्यों का संगान किया। पूज्यवर ने नंदनवन से चातुर्मास समाप्ति पर आगे के विहार का संभावित कार्यक्रम भी घोषित किया।
साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभाजी ने फरमाया कि जब आचार्यश्री भिक्षु ने भाव दीक्षा ली थी, वह समय शुभ था। ज्योतिष के अनुसार सूर्योदय और सूर्यास्त का समय महत्त्वपूर्ण होता है। आचार्यश्री भिक्षु को एक प्रकाश प्राप्त हुआ था और वे उस मार्ग पर चल पड़े। आचार्यश्री भिक्षु ने अरिहंत की आज्ञा ले, 8 पापों का त्याग कर, सिद्धों की साक्षी से संयम के राजमार्ग को स्वीकार कर लिया। आज का दिन आचार्यश्री भिक्षु के समर्पण का दिन है। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशाजी ने फरमाया कि महापुरूषों की सिद्वि उनके सत्व में होती है। संकल्प शक्ति दृढ़ होनी चाहिए। आचार्यश्री भिक्षु में यह गुण देख सकते हैं। घोर विरोधों में भी वे दृढ़ रहे। बाधाओं को दूर करते हुए वे आगे बढ़ते रहे। मुख्य मुनि महावीरकुमारजी ने फरमाया कि तेरापंथ की स्थापना के पीछे कुछ आकाशीय ज्योतिषिय कारण भी थे, जिसका उल्लेख हमारे आगम कल्पसूत्र ग्रंथ में मिलता है। किस तरह जैन धर्म का ह्रास हुआ और फिर किस तरह भगवान के निर्वाण के कुछ वर्षों बाद वि. सं. 1853 के पश्चात जैन धर्म का विकास होता गया। 1853 में तेरापंथ में मुनि हेमराजजी की दीक्षा हुई थी, उसके पश्चात तेरापंथ का भी विकास होता गया। आज के कार्यक्रम में मुनिवृंद एवं साध्वीवृंद ने अलग-अलग गीतिकाओं से अपनी भावना अभिव्यक्त की। संघगान के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ। कार्यक्रम का कुशल संचालन मुनि दिनेशकुमारजी ने किया।