श्रीमद् जयाचार्य का 143वां महाप्रयाण दिवस

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श्रीमद् जयाचार्य का 143वां महाप्रयाण दिवस

चंडीगढ़
मुनि विनयकुमारजी आलोक ने अणुव्रत भवन के तुलसी सभागार में तेरापंथ के चतुर्थ जयाचार्य के 143वें निर्वाण दिवस पर सभा को संबोधित करते हुए कहा कि तेरापंथ के चतुर्थ आचार्यश्री जीतमलजी जैन परम्परा में एक महान प्रतिभाशाली आचार्य हुए हैं। उन्होंने अपनी कृतियों में अपना उपनाम जय रखा। इसलिए वे जयाचार्य के नाम से ही अधिक विख्यात हैं।
जयाचार्य प्रारम्भ से ही स्थिर योगी एवं महान मेधावी थे। चौदह वर्ष की बालवय में उनकी स्थित प्रज्ञा को देखकर एक अन्यमतावलंबी विरोधी भाई के मुख से निकल पड़ा- जिस संघ में ऐसे निष्ठावान स्थिर योगी मुनि विद्यमान है, उस संघ की नींव को कम से कम 100 वर्ष तक तो कोई हिला नहीं सकता। जयाचार्य की विकासशील क्षमताओं को देखकर ऋषिराय ने वि0स0 1894 में उन्हें युवाचार्य पद पर नियुक्त किया। ऋषिराय के स्वर्गवास के वि0स0 1908 माघ शुक्ला पूर्णिमा को उन्होंने तेरपंथ धर्मसंघ का दायित्व संभाला। जयाचार्य के शासनकाल में तेरापंथ धर्मसंघ एक शताब्दी को पार कर दूसरी शताब्दी में चरणन्यास कर रहा था। वह युग विचारों के संक्रमण का युग था। तेरापंथ की आन्तरिक व्यवस्थाएं परिवर्तन मांग रही थी। जयाचार्य ने धर्मसंघ में अनेक व्यवस्थाओं को जन्म दिया। वर्तमान युग में समाजवाद की चर्चा हो रही है। जयाचार्य ने आज से एक शताब्दी पूर्व संघ में संविभाग की व्यवस्था स्थापित कर समाजवाद को मूर्त रूप दे दिया था। जयाचार्य ने न केवल संघीय पुस्तकों धर्माेपकरणों एवं श्रम का ही संविभाग किया। अपितु साधु-सावियों के वर्गों का भी समीकरण किया। उस समय तक साधु-साध्वियों के वर्गों में सहयोगियों की संख्या समान नहीं थी। जयाचार्य ने मनोवैज्ञानिक ढ़ंग से सबके मानस को तैयार कर व्यवस्था को सुचारू रूप प्रदान किया। इस व्यवस्थागत परिवर्तन को आज की भाषा में जयाचार्य की क्रांति कहा जा सकता है। संघ को समृद्ध एवं सुसंगठित रखने के लिए उन्होंने नयी मर्यादाओं का निर्माण किया।
मुनिश्री ने अंत में फरमाया कि जयाचार्य के साहित्य का बहुत बड़ा भाग आचार्य भिक्षु के विचारों को गुम्फित करने में कृतार्थ हुआ है। आचार्य भिक्षु के प्रति वे सर्वात्मना सर्मिपित थे। उन्हें आचार्य भिक्षु का महान भाष्यकार कहा जा सकता है। वे आचार्य भिक्षु के जीवन में इस तरह समा गये की उनकी पहचान द्वितीय भिक्षु के रूप में होने लगी। जयाचार्य महान स्वाध्याय प्रेमी थे। अनेक आगमनों की हजारों गाथाएं उन्हें कण्ठस्थ थी। मुनि मद्यराजजी को अपना उतराधिकार सौंपने के पश्चात वे अपना अधिकार्य समय आगम स्वाध्याय, ध्यान, आत्मचिंतन एवं साहित्य सृजन में लगाते।