आत्मा से परमात्मा बनने का माध्यम है मानव जीवन : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

आत्मा से परमात्मा बनने का माध्यम है मानव जीवन : आचार्यश्री महाश्रमण

अंधेरी, 4 दिसंबर, 2023
अध्यात्म जगत के महासूर्य, अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी ने त्रिदिवसीय अंधेरी प्रवास के दूसरे दिन मंगल प्रेरणा पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि जैन शास्त्रों में एक महत्त्वपूर्ण आगम हैµ उत्तराध्ययन। उसके दसवें अध्ययन में बताया गया है कि मनुष्य-जन्म दुर्लभ है। 84 लाख जीव-योनियाँ बताई गई हैं, जिनमें हमारी आत्मा भ्रमण करती है।
धर्म का एक सिद्धांत है कि आत्मा शाश्वत है, शरीर नश्वर है। हम सबकी आत्मा है, इस जीवन से पहले भी थी और आगे भी रहेगी। चार गतियों में, संसारी अवस्था में आत्मा भ्रमण करती रहती है। मैं आत्मा हूँ, शरीर तो मेरे साथ है, पर दोनों अलग-अलग है।
चार शब्द हैंµव्याधि, आधि, उपाधि और समाधि। शारीरिक बीमारी व्याधि है। मानसिक बीमारी आधि है। भावनात्मक बीमारी उपाधि है। इन तीनों बीमारियों से छुटकारा होता है, तो फिर समाधि शांति रह सकती है। आंतरिक शांति समाधि है। जैन धर्म में कर्मवाद का सिद्धांत है कि आदमी जैसा कर्म करता है, वैसा फल भोगना होता है।
मानव जीवन बड़ा महत्त्वपूर्ण है, जो अभी हमें प्राप्त है। इस मानव जीवन में साधना करके आत्मा से परमात्मा बना जा सकता है। आदमी और पशु में कई बातों में समानता है, पर धर्म की जो साधना इंसान कर सकता है, वो पशु नहीं कर सकता है। आदमी के पास विवेक रहे और विवेक से काम करे तो जीवन अच्छा बन सकता है।
राग और द्वेष नकारात्मक संस्कार हैं। सकारात्मक संस्कार में क्षमा, दया, संतोष आदि है। आसक्ति एक ऐसा रोग है, जो बड़ा नुकसानदेह बन जाता है। विषयों के प्रति ज्यादा आकर्षण होने से व्यक्ति काम में आसक्त हो स्मृति
भ्रंश हो जाता है। विकास का मार्ग रुक सकता है।
अणुव्रत विश्व भारती द्वारा आयोजित डिजिटल डिटोक्स कार्यक्रम के संदर्भ में आचार्यप्रवर ने कहाµआधुनिक यंत्रों को एक अवस्था से देखें तो ये बड़े उपयोगी हैं। अनेक जानकारियाँ मिल सकती हैं। उजला पक्ष हो सकता है, तो अंधेर पक्ष भी हो सकता है। दोनों पक्षों को निष्पक्ष भाव से देखकर अंधेर पक्ष को काम में नहीं लेना चाहिए। सुविधा का दुरुपयोग न हो। मोबाइल को भी नवकारसी कराने का प्रयास करें, उसका संयम करें। रात को 12 बजे से सुबह 7 बजे तक जहाँ तक हो सके अनिवार्य कारण के सिवाय मोबाइल का उपयोग न करें। पूज्यप्रवर ने श्रावक-श्राविकाओं को इसका संकल्प करवाया।खाना खाना और साथ में टी0वी0 देखना ये दो कार्य एक साथ न हों। प्रवृत्ति का संयम होने से आत्मा उज्ज्वल हो सकती है। साध्वीवर्या सम्बुद्धयशा जी ने कहा कि व्यक्ति दुनिया में आता है और चला जाता है। जन्म-मरण के बीच में हमारा जीवन है। हम जीवन कैसा जी रहे हैं, यह महत्त्वपूर्ण है। जीवन एक आइस्क्रीम की तरह क्षणभंगुर है। जो व्यक्ति धर्म करता है, उसका जीवन सफल हो जाता है।
अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी द्वारा आयोजित डिजिटल डिटाॅक्स कार्यक्रम के अंतर्गत प्यारचंद मेहता व अणुविभा के सहमंत्री मनोज सिंघवी ने अपने विचार व्यक्त किए। इस संदर्भ में मुनि जागृत कुमार जी व मुनि अभिजीत कुमार जी ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी। इस कार्यक्रम में विशेष रूप से उपस्थित कैंसर रोग विशेषज्ञ डाॅ0 सौरभ गोस्वामी, तारक मेहता का उल्टा चश्मा के प्रोड्यूसर व डायरेक्टर असित मोदी, भारत सरकार की प्लानिंग कमिश्नर की मेंबर अर्चना जैन, मीरा-भायंदर की विधायक गीता जैन, साइकोलाॅजिस्ट डाॅ0 रिक्की पोरवाल, डाॅ0 निष्ठा दलवानी, स्टेम सेल्स विशेषज्ञ डाॅ0 दिनेश कोठारी ने डिजिटल डिटाॅक्स के संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी। अंधेरी सभाध्यक्ष चैनरूप दुगड़ ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।