आचार्य श्री भिक्षु थे पराक्रमी और निर्भीक : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

सिरियारी। 13 दिसंबर, 2025

आचार्य श्री भिक्षु थे पराक्रमी और निर्भीक : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी तेरापंथ के प्रवर्तक आचार्य श्री भिक्षु की महाप्रयाण स्थली सिरियारी में द्वि दिवसीय प्रवास पर विराजमान हैं। समाधि स्थल परिसर में बने भव्य ‘भिक्षु समवसरण’ में समुपस्थित जनता को पावन पाथेय प्रदान करते हुए कहा कि मनुष्य अनेक चित्तों वाला होता है। आदमी की भावधारा में परिवर्तन भी हो जाता है। हमारे भीतर एक भावों का जगत है। कार्मण शरीर आत्मा के साथ है और कार्मण शरीर के योग का वियोग से एक भावों का जगत निर्मित होता है। कभी आदमी घमण्ड की भाषा में बोलता है तो कभी वह निरहंकार भी हो जाता है। कभी लोभ का भाव है तो कभी संतोष का भाव है। कभी माया की प्रवृत्ति है तो कभी ऋजुता का भाव है। इस प्रकार अनेक विपरीत भाव एक ही आदमी में देखे जा सकते हैं।
जैन दर्शन में छः लेश्याएं बताई गई हैं। ये छः लेश्याएं एक प्रकार से छः भावधाराएं हैं। कृष्ण, नील और कापोत ये तीनों लेश्याएं असत् भावधारा वाली हैं। तेजस्, पद्म और शुक्ल ये तीन सन् भावधारा वाली लेश्याएं हैं। इन सत् और असत् लेश्याओं में भी तारतम्य होता है। आचार्य श्री भिक्षु का जन्म त्रिशताब्दी वर्ष चल रहा है। आचार्य श्री भिक्षु भगवान महावीर के प्रति अनन्य भक्ति भाववाले थे। आचार्य श्री भिक्षु भगवान महावीर के प्रतिनिधि थे और हमारे धर्मसंघ के आद्य आचार्य थे। आगे हमें कार्यालय जाना है और वहां सिरियारी में अधिक रहने का कहा हुआ है। कंटालिया में तेरह रात्रि-प्रवास की संभावना है। आचार्य श्री भिक्षु की माता दीपांबाई को सिंह का स्वप्न आया था। आचार्य भिक्षु पौरूष वाले, पराक्रमी और निर्मिक थे। ऐसे व्यक्ति की मां सिंह का स्वप्न देखे तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है, अस्वाभाविक बात नहीं है। वे कठिनाईयों में भी आगे बढ़ते रहे। आचार्य श्री भिक्षु की ज्ञान चेतना भी विशिष्ट थी वे प्रतिमा और प्रज्ञा के धनी थे। जिननाणी के प्रति उनमें अटूट भक्ति थी। उनका आचार, चारित्र भी उच्च कोटि का था। मुनि श्री हेमराज जैसे शिष्य उन्हें मिले। हेमराज जी स्वामी सिरयारी के सपूत थे। तेरापंथ धर्मसंघ में एक ही मुनिश्री हुए हैं, जिन्हेें आचार्य प्रवर ने शासन महास्तम्भ के रूप में संबोधित किया है।
इस सिरियारी धाम में दो दिनों के लिए हमारा आना हुआ है। हमारे आद्य अनुशास्ता का हम स्मरण, स्तवन भी करते हैं। यहां से धर्म की प्रेरणा मिलती रहे और अध्यात्म की दिशा में आगे बढ़ते रहें। आचार्य श्री की मंगल सभिधि में साध्वी ज्ञानवती जी (लाडनूं) की स्मृतिसभा का अयोजन किया गया। आचार्य श्री ने उनका संक्षिप्त जीवन परिचय प्रस्तुत किया और उनकी आत्मा के अर्ध्वागमन के लिए आध्यात्मिक मंगलकामना की। तदुपरान्त चतुर्विध धर्मसंघ ने आचार्य प्रवर के साथ लोगस्स का ध्यान किया।
साध्वी प्रमुखा विश्रुतविभाजी, मुख्य मुनि श्री महावीर कुमार जी ने भी उनकी आत्मा के प्रति आध्यात्मिक ऊर्ध्वारोहण की मंगलकामना की। साध्वी श्रुतयशा ने भी इस संदर्भ में अपनी अभिव्यक्ति दी। सिरियारी में विराजमान संत वृंद ने सामूहिक गीत की प्रस्तुति दी और भावनाओं की अभिव्यक्ति दी। मुनिचेतन कुमार जी व मुनि धर्मेश कुमार जी ने भी अपनी भावामिव्यक्ति दी। विजय नाहर ने स्वयं द्वारा लिखित पुस्तक ‘इतिहास एवं विरासत’ को सिरियारी संस्थान के पदाधिकारियों के साथ आचार्य प्रवर के समक्ष लोकर्पित की। आचार्य प्रवर ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। सिरयारी संस्थाना के मंत्री श्री मर्यादा कोठारी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आचार्य श्री भिक्षु समाधि स्थल संस्थान, सिरियारी द्वारा सामूहिक गीत का संगान किया।