ज्ञान प्राप्त करने के लिए होना चाहिए विनय और विनम्रता का भाव : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

राणावास। 11 दिसंबर, 2025

ज्ञान प्राप्त करने के लिए होना चाहिए विनय और विनम्रता का भाव : आचार्यश्री महाश्रमण

मारवाड़ की धरा पर अध्यात्म की गंगा प्रवाहित करते हुए निरंतर गतिम जैनश्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ के वर्तमान अधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी गुरुवार को प्रातः गुड़ा रामसिंह से राणावर की ओर प्रस्थित हुए और लगभग 9 किमी. का विहार परिसंपन्न कर राणावास के श्री जैनश्वेताम्बर तेरापंथी मानव हितकारी संघ, विद्याभूमि परिसर में पधारे। विद्यालय के छात्र-छात्राओं व शिक्षकों तथा संबंधित पदाधिकारियों ने पूज्य प्रवर का भाव भक्तिपूर्ण स्वगत किया।  विद्याभूमि परिसर  में बने विशाल प्रवचन पण्डाल में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित श्रद्धालुओं, विद्यार्थियों आदि को अमृत देशना प्रदान करते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि हमारे जीवन में ज्ञान का बहुत महत्व है। ज्ञान एक पवित्र चीज होती है और ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयास भी किया जाता है। अनेक शिक्षा संस्थान हैं जहां से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। 
शिक्षा प्राप्ति के लिए बाधाओं से बचना चाहिए। आगम में शिक्षा की प्राप्ति में पांच बाधाएं बताई गई है। उनमें पहले है- अहंकार। हमारे गुरु, पूजनीयों और वंदनीयों के समक्ष जब तक आदमी झुकेगा नहीं तो वह ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकेगा। जो विनयशील होता है, वहीं विद्या का अर्जन कर सकता है। इसलिए ज्ञान प्राप्ति में अहंकार एक बाधा है, ज्ञान प्राप्त करने के लिए आदमी के भीतर विनय और विनम्रता का भाव होना चाहिए। दूसरी बाधा है- क्रोध। यदि विद्यार्थी को गुस्सा अधिक आता है तो वह भी ज्ञान प्राप्ति में बाधा है। अतः विद्यार्थी को अपनी प्रकृति को शान्त रखने का प्रयास करना चाहिए। तीसरी बाधा है- प्रमाद। जो विद्यार्थी प्रमाद में चला जाए, नशे आदि का सेवन करने लगे तो भलाव ह ज्ञान का अर्जन कैसे कर सकता है? विद्यार्थी विभिन्न आमोद-प्रमोद विषयों में रूचि लेने लग जाए तो उसके ज्ञान में बाधा आ सकती है। विद्या प्राप्ति में चौथी बाधा बताई गई है- रोग। कोई विद्यार्थी रोग ग्रस्त हो जाए, उसे किसी भी प्रकार की बीमारी हो जाए तो उससे भी विद्या प्राप्ति में बाधा आ सकती है। विद्यार्जन में पांचवीं बाधा है- आलस्य। आलस्य मनुष्यों को महान शत्रु है और वह मनुष्य के शरीर में रहता है। ज्ञान प्राप्ति में श्रमशीलता बहुत सहायक होती है अतः विद्यार्थी में पुरूषार्थ होना चाहिए। इन पांच बाधाओं से जो मुक्त रहता है और अच्छे ढंग से ज्ञान प्राप्ति को प्रयास करता है, प्रतिभा हो और शिक्षक अच्छी प्रकार ज्ञान देने का प्रयास करे विद्या का, ज्ञान का अर्जन हो सकता है। शिक्षकों का तो कर्त्तव्य होता है कि भावी पीढ़ी को ज्ञान के साथ-साथ अच्छे संस्कार देने का प्रयास करें।  आचार्यश्री तुलसी के समय जीवन विज्ञान का उपक्रम प्रारंभ हुआ था। विद्यार्थियों में बौद्धिक व शारीरिक विकास के साथ-साथ भावात्मक विकास भी आवश्यक होता है। पूज्य प्रवर ने समुपस्थित विद्यार्थियों को सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की प्रेरणा प्रदान करते हुए प्रतिज्ञाओं को स्वीकार करने हेतु आह्वान किया और विद्यार्थियों ने अपने स्थान पर खड़े होकर संकल्पों को स्वीकार किया।  आचार्य प्रवर ने कहा कि आज हमारा राणावास में आना हुआ है। यहां सन् 1982 में परम पूजनीय आचार्यश्री तुलसी ने चातुर्मास किया था। यहां के लोगों में अच्छे संस्कार बने रहे। 
आचार्य प्रवर के मंगल उद्बोधन के उपरान्त साध्वी प्रमुखा विश्रुत विभाजी ने जनता व विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज बालकों में अनेक प्रकार की समस्याएं हैं जैसे स्मृति, एकाग्रता का न होना, परीक्षा से भय, छोटी-छोटी बातों पर क्रोध करना आदि। यदि उन्हें ज्ञान प्राप्त करना है, आगे बढ़ना है तो इन समस्याओं से मुक्त रहना होगा। खेल और अध्ययन में संतुलन बिठाना होगा। तत्पश्चात् श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी मानव हितकारी संध संस्थान के अध्यक्ष श्री मोहनलाल शादिया, मंत्री श्री सुनील बाफना तथा कोषाध्यक्ष श्री मुकेशजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा भरे गए लगभग 2001 नशामुक्ति संकल्प पत्र आचार्यश्री के चरणों में समर्पित किए। जैन विश्व भारती के अध्यक्ष श्री अमरचंद लुंकड़, श्री अभिषेक दूगड़ व श्री प्रमोद डी. नाहर ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। तेरापंथ महिला मंडल राणावास ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। संस्थाओं की छात्राओं, छोटे-छोटे विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियां दी। आचार्यश्री ने विद्यार्थियों को मंगल आशीर्वाद व प्रेरणाएं प्रदान की। साध्वी काव्यलताजी ने आचार्यश्री के समक्ष अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मारवाड़ जंक्शन के उपखण्ड अधिकारी श्री महावीर सिंह जोधा ने भी अपनी अभिव्यक्ति दी।