भगवान महावीर और आचार्य भिक्षु के जीवन की अनेक बातों में समानता है : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

सिरियारी। 12 दिसंबर, 2025

भगवान महावीर और आचार्य भिक्षु के जीवन की अनेक बातों में समानता है : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, शांतिदूत युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी धवल सेना के साथ राणावास से मंगल प्रस्थान कर सिरियारी में तेरापंथ धर्मसंघ के प्रणेता महामना आचार्यश्री भिक्षु के समाधिस्थल पधारे तो मानों हजारों श्रद्धालुओं के आस्था, विश्वास, उमंग व उत्साह में नवीन ऊर्जा का संचार हो गया। सिरियारी में न केवल तेरापंथी श्रद्धालु अर्पित जैन एवं जैनेत्तर श्रद्धालु भी महामानव के दर्शन को उत्सुक दिखाई दे रहे थे। आचार्य प्रवर सर्वप्रथम अपने आद्य अनुशास्ता को श्रद्धा प्रणति अर्पित करने हेतु आचार्य भिक्षु समाधि स्थल पधारे। समाधि स्थल पर पूज्य गुरुदेव कुछ समय के लिए ध्यानस्थ हुए तत्पश्चात् प्रवास स्थल पधारे।
सिरियारी में विराजमान संतों तथा बहिर्विहार से पहुंची साध्वियों ने भी आचार्यश्री का भावभीना अभिनंदन किया। मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम “भिक्षु समवसरण” में चतुर्विध धर्मसंघ को आर्हत् वांग्मय आधारित अमृत देशना प्रदान करते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी ने कहा कि हमारे तेरापंथ धर्म संघ में 32 आगम मान्यता प्राप्त हैं। अन्य सम्प्रदायों में और भी आगम मान्य हो सकते हैं परन्तु जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म संघ ने बत्तीस आगमों को प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया है। बत्तीस आगमों में ग्यारह अंग, बारह उपांग, चार मूल, चार छेद और एक आवश्यक है। इन बत्तीस आगमों से प्राप्त निर्देश या प्रेरणा सम्माननीय हो जाती है। इनमें जो भी सिद्धान्त और आचार की बात प्राप्त होती है, उसको सम्मान दिया ही जाता है। इन बत्तीस आगमों में जो चार मूल हैं उनमें एक है- दशवे आलियं। दशवें आलियं को चारित्र आत्मा समुदाय में कंठस्थ करने की परम्परा चल रही है। इस आगम में साध्वाचार के अनेक नियम व निर्देश बताए गए हैं। किसी साधु का मन अस्थिर हो जाए तो क्या करना चाहिए यह दशवें आलियं की प्रथम चूलिका में मार्गदर्शन दिया गया है।
आज हम हमारे आद्य अनुशास्ता, प्रथम आचार्य, आचार्यश्री भिक्षु से जुड़े स्थान में आए हैं। राजनगर, केलवा आदि भिक्षु स्वामी से जुड़े स्थानों से होते हुए स्वामीजी के जीवन से अंतिम रूप से जुड़े हुए सिरियारी नगर में आए हैं। आचार्य भिक्षु के जीवन को पढ़ने और चिंतन मनन करने से यह ज्ञात होता है कि उनका एक विशिष्ट साधना का जीवन रहा होगा। भगवान महावीर और आचार्य भिक्षु के जीवन की अनेक बातों में समानता मिलती है। आचार्य भिक्षु युवावस्था में संत बनने वाले एक महात्मा थे। हम आचार्य भिक्षु के ज्ञान को देखें, उनके ग्रन्थों को देखें और उनके संस्मरणों को देखें तो ज्ञात होता है कि उनमें ज्ञानावरणीय कर्म का विशिष्ट क्षयोपशम था। सिरियारी में अंतिम चातुर्मास के दौरान उन्होंने अनशन किया और अनशन के दौरान ऐसा प्रतीत होता है कि उन्हें अतीन्द्रिय ज्ञान भी प्राप्त हुआ यद्यपि निश्चय में कुछ भी कहना कठिन है। अनशन में उन्होंने इस औदारिक शरीर से मुक्ति प्राप्त की थी।
यहां आचार्यश्री महाप्रज्ञजी ने चातुर्मास किया था। गुरुदेव तुलसी के भी चातुर्मास का कुछ स्पर्श सिरियारी में हो गया था। गुरुदेव तुलसी हमारे धर्म संध में नवम् अधिशास्ता के रूप में मिले। आचार्यश्री ने आचार्यश्री भिक्षु से संबद्ध अनेक गीतों का आंशिक संगान किया। तत्पश्चात् कहा कि तीन वर्षों के अन्तराल के पश्चात् यहां आना हुआ है। मुनि मुनिव्रतजी और मुनि धर्मेशकुमारजी यहां इस समय उपस्थित हैं। अनेक साध्वियां भी यहां पहुंच गई हैं। सभी में अच्छा विकास हो। आचार्यश्री के स्वागत में तेरापंथी सभा सिरियारी के अध्यक्ष श्री नवीन छाजेड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। तेरापंथ समाज ने आचार्यश्री के स्वागत में गीत का संगान किया। आचार्यश्री भिक्षु समाधि स्थल संस्थान के स्वागताध्यक्ष श्री धर्मेन्द्र महनोत ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री भिक्षु समाधि स्थल संस्थान के अध्यक्ष श्री निर्मल श्रीमाल ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। सिरियारी संस्थान की ओर से भिक्षु जैन कैलेण्डर को आचार्यश्री के समक्ष लोकार्पित किया गया।