गुरुवाणी/ केन्द्र
मोक्ष का मार्ग है दुःख मुक्ति का मार्ग : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, मानवता के मसीहा, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी ने आज प्रातःकाल अपनी धवल सेना के साथ खिंवाड़ा गांव से प्रस्थान किया और लगभग 10 कि.मी का विहार कर जाणुंदा गांव में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। विद्यालय परिसर से आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में समुपस्थित जनता को ‘आचार्य श्री तुलसी दीक्षा शताब्दी और मुमुक्षु का महत्व पर पावन प्रतिबोध प्रदान करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहा कि एक सामान्य रास्ता होता है जिस पर आमतौर से कोई भी चल सकता है दूसरा कुठ कठिन रास्ता और महान मार्ग होता है, जिस पर चलना हर किसी के लिए संभव नहीं होता। एक महापथ जिस पर महान लोग चल सकते हैं अथवा जिस पर चलने से महान मंजिल प्राप्त हो सकती है उसे हम महावीथि कह सकते हैं। उस महावीथि पर चलने वाला वीर पुरूष हो सकता है।
दो मार्ग हैं- एक मोह का मार्ग और दूसर मोक्ष का मार्ग। मोहा का मार्ग संसार का मार्ग है, मोक्ष का मार्ग दुःख मुक्ति का मार्ग है। मोह के मार्ग पर चलने से जन्म-मरण की परम्परा प्रवर्धमान बन सकती है, मोक्ष के मार्ग पर चलने से जन्म-मरण की परम्परा से मुक्ति हो सकती है। आज पौष कृष्ण पंचमी है। आज से 100 वर्ष पूर्व वि.सं. 1982 को एक बालक ने मोह का मार्ग छोड़कर मोक्ष का मार्ग स्वीकार किया था। तीन चीजें दुर्लभ बताई गई हैं- पहल है मनुष्य जन्म का मिलना, दूसरी मुमुक्षा का भाव मिलना और तीसरा महापुरूषौं का मौका मिलना। आज के दिन हमारे धर्म संघ के आठवें अधिशास्ता आचार्य श्री कालूगणी ने तुलसी नामक बालक को साधुत्व की दीक्षा दी थी, आज उस घटना को सौवर्ष पूर्ण हो गए हैं। आचार्य कालूगणि को इस रूप में उनका उत्तराधिकारी मिल गया। दीक्षा लेने से पूर्व मुमुक्षा होनी चाहिए।
सम्यकत्व के पांच लक्षणों शम, संवेग, निर्वेद, अनुकंण और आस्तिकेय में एक लक्षण संवेगा का अर्थ है- मोक्ष की आभिलाषा आर्थात् मुमुक्षु है। मुमुक्षु के होने पर ही सम्यकत्व और साधुत्व की बात हो सकती है संसार सागर को पार पाने की भावना का भाव ही मुमुक्षा है। अभव्य जीव सौ बार भी दीक्षा ले तो भी उसे मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। पूज्य प्रवर मुमुक्षा की चर्चा कर ही रहे थे कि सामने की ओर अवस्थित मुमुक्षु पृषा से कुछ तात्विक प्रश्न आचार्य श्री ने पूछे, जिनका मुमुक्षु पृषा ने उत्तर दिया। आचार्य श्री ने कहा कि इस परीक्षा में उत्तीर्ण हो गई हो। मुमुक्षु ने अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति देते हुए दीक्षा प्रदान करने हेतु निवेदन किया तो आचार्य श्री ने उसके परिजनों से उनके भावों की जानकारी करने के उपरान्त मुमुक्षु पृशा पर विशेष कृपा कराते हुए जैन विश्व भारती लाडनूं में गुरुदेव तुलसी की मासिकी पुण्य तिथि चैत्र कृष्णा तृतीया तदनुसार 6 मार्च 2026 को साध्वी दीक्षा प्रदान करने की घोषणा की।
इस घोषणा से पूरा पांडाल जय घोष से गुंजित हो गया। आचार्य श्री ने पुनःकहा कि आज के दिन परमपूजनीय आचार्य श्री तुलसी ने साधुत्व की दीक्षा स्वीकार की थी। ग्यारह वर्षों बाद वे युवाचार्य बने और शीघ्र ही आचार्य बन गए। उन्होंने कितने साधुओं, साध्वियों और समण श्रेणी को दीक्षा प्रदान की थी। आज उनकी दीक्षा की सौ वर्ष की संपन्नता पर मैं उन्हें वंदन और श्रद्धा का अर्पण करता हूं। आचार्य श्री ने कहा कि जाणुन्दा आए हैं। बेंगलूर चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष मुलचंद जी नाहर का गांव है। उनके परिवार की सेवा का क्रम शेषकाल में भी चलता रहता है। यहां के सभी लोगों में धार्मिकता बनी रहे। पूरे नाहर परिवार में अच्छी भावना व धार्मिकता बनी रहे। आचार्य प्रवर ने मुमुक्षु जहान बेताला की भी संक्षिप्त परीक्षा लेकर उसे भी जैन विश्व भारती-लाडनूं में दीक्षा प्रदान (साधु दीक्षा) करने की घोषणा की।
आचार्य श्री के मंगल प्रवचन के उपरान्त साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा जी ने आचार्य श्री तुलसी के प्रति अपनी श्रद्धामिव्यक्ति करते हुए कहा कि बालक तुलसी ने परम पूज्य कालूगणी से लाडनूं में सन्यास स्वीकार किया। मुनि तुलसी की ग्रहणशीलता बहुत अच्छी थी, अध्ययन में बचपन से उनका लगाव था और अल्प समय में ही उन्होंने ज्ञान का के.स्थीकरण कर लिया था। आचार्य श्री तुलसी का ज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश संघ के लिए बहुत हितकारी बना। कालूगणी की उन पर विशेष कृपा रही और यह विशेष कृपा ही उन्हें विकास के क्षेत्र में आगे बढ़ाती रही। जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा के अध्यक्ष मनसुख लाल सेठिया ने अपनी भावा-भिव्यक्ति दी। राजस्थान सरकार के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति दी व मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया। समणी श्रद्धाप्रज्ञा जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। नाहर परिवार के सदस्यों ने गीत का संगान किया। शशिबाई नाहर व मुकेश नाहर ने अपनी अभिव्यक्ति दी।