स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
जीवन के नौवे दशक के पूर्वार्ध में भी गुरुदेव श्री तुलसी अपने आपको युवा मानते हैं। कार्य के प्रति उत्साह, आशावादी दृष्टिकोण, व्यस्त जीवन-चर्या, वैचारिक स्फुरणा, मुसीबतों को झेलने की तैयारी आदि विशेषताओं से परिपूर्ण उनकी जीवन-शैली उनमें तारुण्य का दर्शन करवा रही है।
युवावर्ग से आचार्यप्रवर बहुत आशान्वित हैं। वे युवा समाज को आगे लाना चाहते हैं। वे अपने युवा समाज को विकास के शिखर पर आरूढ़ हुआ देखना चाहते हैं। उसके लिए आवश्यक है-
गम्भीर अध्ययन
महात्मा गांधी ने कहा था- 'युवाओं के दिल से करुणा का श्रोत सूखता जा रहा है, यह बहुत बड़ी चिन्ता का विषय है। इसी प्रसंग को उद्धृत करते हुए एक बार आचार्य श्री तुलसी ने कहा-युवाओं में गम्भीर साहित्य पढ़ने की रुचि नहीं है, यह बड़ी चिन्ता का विषय है। आचार्य श्री युवापीढ़ी को अध्ययनशील देखना चाहते हैं। संस्कृति को सुदीर्घजीवी बनाने में साहित्य का बहुत योगदान रहता है। अपेक्षा है उसके पठन-पाठन की। साहित्य-पठन से विचारों का परिष्कार और पोषण होता है।
खाद्य-विवेक और संयत आचार
जैन परम्परा में आहार-शुद्धि और व्यसन-मुक्ति का बहुत महत्त्व रहा है। महात्मा गांधी को भी उनकी मां ने एक जैन संत से व्यसन मुक्ति का नियम दिलाया था। आज जैन कहलाने वाले ऐसे अनेक युवक मिल जाएंगे, जिनके जीवन में आहार-शुद्धि का अभाव है, दुर्व्यसनों का साम्राज्य है। स्मोकिंग, ड्रिंकिंग, अभक्ष्य-भक्षण आदि उनको जीवन-शैली के अंग बने हुए हैं। गुरुदेवश्री इसके लिए बहुत प्रयास कर रहे हैं। उपासना में आनेवाले युवावर्ग के जीवन की प्रतिलेखना (निरीक्षण, सार-संभाल) वे अक्सर कर ही लिया करते हैं और उन्हें बद आदतों को छोड़ने के लिए अभिप्रेरित करते हैं। गुरुवर ने तेरापंथ की पहचान के लिए तीन घोष दिये हैं। उनमें तीसरा घोष है-
तेरापंथ को क्या पहचान।
व्यसन-मुक्त जीवन-सन्धान ।।
तेरापंथी की पहचान हो कि उसका जीवन व्यसन-मुक्त। आज की युवापीढ़ी प्रबुद्ध हुई है, उसमें शिक्षा का विकास हुआ है। ड्रिंकिंग के हानिकारक प्रभावों से भी वह अनभिज्ञ नहीं है। पर अनुपयुक्त संगति आदि के कारण उनमें वह आदत घर कर जाती है। युनान के दार्शनिक को किसी ने कीमती शराब भेंट की। उसने बोतल का ढक्कन उतारा और सामने पड़ी मिट्टी में शराब को गिरा दिया। भेंटकर्ता यह देख हैरान था। उसने कहा-महाशय! यह क्या किया? मैंने सप्रेम आपको बहुमूल्य शराब उपहृत की और आपने उसको मिट्टी में मिला दिया! दार्शनिक ने उत्तर दिया-यदि मैं शराब को मिट्टी में नहीं मिलाता तो शराब मेरे दिमाग को मिट्टी में मिला देती।
गुरुवर का यह स्वप्न है कि समाज का हर युवक, हर व्यक्ति व्यंसन-मुक्त जीवन जीये।
जैन जीवन-शैली
आज का आदमी एक अलग किस्म की जीवन-शैली से जी रहा है। उसके प्रधान अंग हैं-मानसिक तनाव, अशान्ति, विषमता, लालसा आदि। उनके कारण अनेक बीमारियां उत्पन्न होती हैं। हाइपरटेन्शन (नैत्य उच्च रक्तचाप) दिल का दौरा, नाड़ी तन्त्रीय अस्तव्यस्तता (नर्वस ब्रेक डाउन), अनिद्रा आदि रोग उसी जीवन शैली के निमित्त से होने वाली निष्पत्तियां हैं। सुखी और शान्तिपूर्ण जीवन जीने के लिए जीवन-शैली में परिष्कार अपेक्षित है।
योगक्षेम वर्ष में जैन जीवन-शैली जनता के समक्ष प्रस्तुत की गई। उसके वर्तमान में निम्नलिखित नौ सूत्र हैं। वे इस प्रकार हैं-
१. सम्यक् दर्शन २. अनेकांत ३. अहिंसा ४. समण संस्कृति (सम, शम, श्रम) ५. इच्छा परिमाण ६. सम्यक् आजीविका ७. सम्यक् संस्कार ८- साधर्मिक वात्सल्य ६. आहार-शुद्धि और व्यसनमुक्ति।
प्रस्तुत जीवन-शैली से जीनेवाले व्यक्ति का जीवन उन्नत होगा। धर्म उसके जीवन-व्यवहार में मुखर रहेगा। औरों के लिए भी वह आदर्श होगा। इसका प्रशिक्षण एवं प्रयोग मूल्यवान है। कुछ वर्ष पूर्व एक युवादम्पती अपनी सुपुत्री के साथ जैन जीवन-शैली का प्रशिक्षण लेने हेतु जैन विश्व भारती में आये। एक सप्ताह यहां रहे। उन्होंने जैन जीवन-शैली के नौ सूत्रों का प्रशिक्षण लिया। गुरुदेव श्री की यह तमन्ना है कि ऐसे परिवारों की संख्या वृद्धिंगत हो ताकि वे जैन जीवन शैली के प्रति आस्थावान होकर तदनुरूप) कार्य करें। शान्ति से जीवन-यापन करें।