स्वाध्याय
श्रमण महावीर
राज्य-व्यवस्था द्वारा भी संग्रह प्रतिबंधित नहीं था। हर व्यक्ति को संग्रह करने की मुक्त छूट थी। इसे समझने में मम्मण की घटना बहुत सहायक होगी।
आषाढ़ की पहली रात बादलों से घिरा हुआ आकाश। घोर अंधकार। तूफानी हवा । उफनती नदी का कलकल नाद। इस वातावरण में हर आदमी मकान की शरण ले रहा था।
सम्राट् श्रेणिक महारानी चेल्लणा के साथ प्रासाद के वातायन में बैठे थे। बिजली कौंधी। महारानी ने उसके प्रकाश में देखा, एक मनुष्य नदी के तट पर खड़ा है और उसमें बहकर आए हुए काष्ठ-खण्डों को खींच खींचकर संजो रहा है। महारानी का मन करुणा से भर गया। उसने श्रेणिक से कहा- 'आपके राज्य में लोग बहुत गरीब हैं। आपका प्रशासन उनकी गरीबी को मिटाने का प्रयत्न क्यों नहीं करता? मुझे लगता है कि आप भी नदी की भांति भरे हुए समुद्र को भरते हैं। खाली को कोई नहीं भरता।'
'मेरे राज्य में कोई भी आदमी गरीब नहीं है। रोटी, कपड़ा और मकान सबको सुलभ हैं। फिर तुमने यह आरोप कैसे लगाया?'
'मैं आरोप नहीं लगा रही हूं, आँखों देखी घटना बता रही हूं।'
'उसका प्रमाण है तुम्हारे पास?'
'प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता है? मैं आपसे एक प्रश्न पूछती हूं कि कालरात्रि में यदि कोई आदमी जंगल में काम करे तो क्या आप नहीं मानेंगे कि वह गरीब नहीं है, भूखा नहीं है?'
'अवश्य मानूंगा। पर इस समय किसी मनुष्य के जंगल में होने की संभावना नहीं है।'
'महाराज। बिजली कौंधते ही आप इस दिशा में देखिए कि नदी के तट पर क्या हो रहा है?'
सम्राट् ने कुछ ही क्षणों में उस मनुष्य को देखा और वे स्तब्ध रह गए। उनका सिर लज्जा से झुक गया। उन्होंने अपने शासन की विफलता पर महान् वेदना का अनुभव हुआ। महारानी का आक्रोश उनकी आँखों के सामने घूमने लगा। सम्राट ने राजपुरुष को भेजकर उस आदमी को बुला लिया। वह सम्राट् को प्रणाम कर खड़ा हो गया। सम्राट् ने पूछा- 'भद्र ! तुम कौन हो?'
'मेरा नाम मम्मण है।'
'तुम कहां रहते हो?'
'मैं यहीं राजगृह में रहता हूं।'
'भद्र! इस तूफानी रात्रि में कोपीन पहने तुम नदी के तट पर खड़े थे। क्या तुम्हें रोटी सुलभ नहीं हैं?'
'रोटी बहुत सुलभ है, महाराज!'
'फिर यह असामयिक प्रयत्न क्यों?'
'मुझे एक बैल की जरूरत है, इसलिए मैं नदी में प्रवाहित काष्ठ-खण्ड़ों को संजो रहा था।'
'एक बैल के लिए इतना कष्ट क्यों? तुम मेरी गोशाला में जाओ और तुम्हें जो अच्छा लगे, वह बैल ले लो।'
'महाराज! मेरे बैल की जोड़ी का बैल आपकी गोशाला में नहीं है, फिर मैं वहां जाकर क्या करूंगा।'
'तुम्हारा बैल क्या किसी स्वर्ग से आया है?'
'कल प्रातःकाल आप मेरे घर चलने की कृपा करें, फिर जो आपका निर्देश होगा, वही करूंगा?'