स्वाध्याय
संबोधि
तप दुःख नहीं, आनंद का कारण है। जिससे शुद्धि हो, आवरण छिन्न हो, उसमें आनंद का प्रश्न ही खड़ा नहीं हो सकता। वह उन लोगों के लिए दुःखद हो सकता है जिन्हें शुद्धि का बोध नहीं हैं। किन्तु इससे पूर्व शरीर और चेतना का भेद-विज्ञान अत्यंत अपेक्षित है। ज्ञान, दर्शन और तप तीनों की संयुक्ति है। एक के अभाव में पूर्णता कहीं नहीं होती। आचार्य ने स्पष्ट सूचना दी है कि तप रहित ज्ञान और ज्ञान रहित तप कृतार्थ नहीं होते। चाहे व्यक्ति कितना ही महान् तप का आचरण करे। यदि तप भेद-विज्ञान से शून्य है तो निर्वाण को प्राप्त नहीं होता। समस्त शास्त्रों का पारायण, संयम का पालन और तप का सेवन भले करो किन्तु जब तक आत्म दर्शन नहीं होता, तब तक मोक्ष नहीं है। समत्व के अभाव में बनवास, कायक्लेश, विचित्र प्रकार के उपवास, अध्ययन, मौन आदि आचरण क्या करेंगे? इससे यह स्पष्ट होता है कि जीवन में ज्ञान की आराधना, दर्शन की आराधना और चारित्र की आराधना ये तीनों अनिवार्य हैं। इसमें भी सम्यग् दर्शन प्रमुख है। जो प्रमुख है उसे गौण न बनायें। प्रमुख के साथ ही 'तप' सोने में सुगन्ध का काम करेगा। तप से बल बढ़ता है। तप संवर और निर्जरा का हेतु है। तप शनैः शनै विषयों से वितृष्णा पैदाकर मुक्ति को सन्निकट करता है। महावीर के तप का सर्वांगीण अवलोकन कर हम समझ सकेंगे कि इसका इतना महत्त्व क्यों है?
तप : बाह्य और आभ्यन्तर
तप को महावीर ने योग की तरह दो भागों में विभक्त किया है, बाह्य तप और आंतरिक तप। ये भेद केवल औपचारिक हैं। स्थूल और सूक्ष्म शरीर की भांति ये भी संयुक्त हैं। सूक्ष्म की अभिव्यक्ति का माध्यम स्थूल है। आंतरिक तप का प्रभाव स्थूल पर आये बिना नहीं रह सकता है और स्थूल का भी सूक्ष्म पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। बाह्य तप इसलिए है कि उसका बाहर के पदार्थों के साथ संबंध है तथा वह परिदृश्य है।
आंतरिक तप में दूसरों को भिन्न भी अनुभव हो सकता है। या वह अज्ञात भी रह सकता है। उसका संबंध केवल व्यक्ति से है। वह कब, कैसे कर रहा है यह ज्ञात नहीं होता। बाहर के संबंधों की वह पूर्णतया उपेक्षा कर देता है। उसका प्रमाण वह स्वयं ही है। जापान का सम्राट् महान् साधक रिझाई के पास पहुंचा और पूछा-'मैं कैसे जानूं कि आपने जान लिया है। रिझाई ने उत्तर दिया-'मुझे देखो, मेरे कार्यों को देखो, यदि समझ सको तो समझ लेना।' सम्राट् ने कहा-'आपको देखने से क्या होगा ? कृपया कोई प्रमाण बतायें।' रिझाई ने कहा-और कोई गवाह प्रमाण नहीं है। क्रियाओं से ही जान सको तो जानो।