रचनाएं
आचार्य तुलसी को नमन
दीप-सा जलता एक संकल्प,
व्रत-सी निर्मल थी उनकी दृष्टि,
करुणा, सेवा, संयम का पथ,
जग को दे गए नई चेतना-सृष्टि।
बाल-वय में ही ले ली दीक्षा,
धर्म पथ का कठिन निर्णय,
मानवता का था जो स्वप्न,
उसे बना दिया उन्होंने जीवन-कार्य।
हर शब्द बना प्रेरणा-मंत्र,
हर कदम एक उजली राह,
अहिंसा की सुगंध लिए वो,
चलते रहे बिना किसी चाह।
संघ-नायक, विचार-विभूषित,
तेरापंथ का गौरव-दीप,
तप और त्याग के साधक तुलसी,
युग-युग जीवित उनका रूप।
आज पुनः उस शुभ दिवस पर,
हम श्रद्धा के दीप जलाएँ,
उनकी वाणी, उनके दर्शन,
अपने अंतर में उतारें, अपनाएँ।
दीक्षा दिवस का यह पर्व,
संयम की पुकार सुनाता,
आचार्य तुलसी का जीवन-संदेश—
“मानव धर्म ही सच्चा धर्म कहलाता।”