तेरापंथ मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन

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कोलकाता।

तेरापंथ मेरापंथ कार्यशाला का आयोजन

युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार जी के सान्निध्य में तेरापंथ मेरापंथ कार्यशाला का सफल आयोजन श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा साल्टलेक द्वारा आयोजित किया गया। जिसके मुख्य प्रशिक्षक उपासक सुशील बाफना थे। कार्यशाला में संबोधित करते हुए मुनि जिनेश कुमारजी ने कहा जिनशासन का एक धार्मिक संगठन है-तेरापंथ । तेरापंथ तेजस्वी, यशस्वी, मनस्वी शासन है। उसकी तेजस्विता का मूल आचार है। आचार्य भिक्षु इस संगठन के आद्य प्रवर्तक है। वे अपने युग के विलक्षण, विचक्षण, विशिष्ट, विवेक सम्पन्न व युगस्रष्टा पुरुष थे। वे जमाने के थपेड़ो से घबराए नहीं। जब उन्हें सत्य का प्रकाश मिला, तब उन्होंने निर्भीक होकर उस जमाने की स्थितियों पर खुलकर सेद्धान्तिक विश्लेषण किया।
उन्होंने दान, दया, मिथ्यात्वी की करणी, मिश्रधर्म, अल्पपाप बहु-निर्जरा आदि विषयों पर स्पष्ट चिंतन धार्मिक जगत के सामने रखा। उन्होंने आचार्य भिक्षु द्वारा कथित लौकिक व लोकोत्तर दान विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा लौकिक दान के अनेक प्रकार है किंतु लोकोत्तर दान के तीन प्रकार अभयदान, ज्ञानदान व संयतिदान है। जिस दान से संसार भ्रमण कम होता है वह दान ही लोकोतर दान है। दान के साथ नाम, यश व भौतिक भांग की इच्छा नहीं करनी चाहिए। दान दिल से देना चाहिए न कि दिमाग से। सुपात्र दान से तीर्थंकर नाम गोत्र का भी उपार्जन दिया जा सकता है। आचार्य भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी वर्ष के अवसर पर अधिक से अधिक आचार्य भिक्षु के विचारों को समझने का प्रयत्न करना चाहिए।
इस अवसर पर मुनि परमानंद ने कहा - आचार्य भिक्षु द्वारा की गई आचार, विचार ने व्यवस्था क्रांति का समन्वित रूप है-तेरापंथ । मुनि कुणाल कुमार जी ने सुमधुर गीत का संगान किया। कार्यक्रम का शुभारंभ तेरापंथ महिला मंडल, साल्टलेक की बहनों के स्वागत गीत से हुआ। इस अवसर पर स्वागत भाषण श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, साल्टलेक के अध्यक्ष जयसिंह डागा ने दिया। आभार ज्ञापन इंद्र चंद जी नाहटा के किया।