स्वाध्याय
धर्म है उत्कृष्ट मंगल
जैन आगमों में महावण्णे (महाप्रज्ञ, पण्णवं (प्रज्ञावान्) और पण्णा (प्रज्ञा) -इन शब्दों का प्रयोग मिलता है। ये बहुत गरिमापूर्ण शब्द हैं। अल्पज्ञ व्यक्ति भी महाप्रज्ञ बन सकता है। वह प्रज्ञा के शिखर पर भी आरोहण कर सकता है। उसके लिए सम्यक् दिशा में प्रस्थान और सम्यक् पुरुषार्थ अपेक्षित है। उसके कुछ दिशा निर्देशक तत्त्व बन सकते हैं। जैसे-
1. सत्य-समर्पण– यथार्थ चिन्तन, यथार्थ श्रद्धान और यथार्थ भाषण का संकल्प एवं तदनुरूप अभ्यास। सत्य-समर्पित व्यक्ति का सिद्धांत होता है– जो सत्य है वह मेरा है फिर चाहे वह कहीं से भी उपलब्ध क्यों न हो। ऐसा व्यक्ति पूर्वाग्रह ग्रस्त नहीं रहता। वर्षों की बद्धमूल धारणा भी यदि असत्य प्रतीत हो जाती है तो उसे भी उखाड़ फेंकने में वह झिझकता नहीं। ऐसा व्यक्ति अनाग्रह और आग्रह दोनों की उपासना करता है। 'जो सत्य है वह मेरा है' इस बात का वह आग्रह (पकड़) रखता है। 'सत्य क्या है और कहां से मिलता है'- इस विषय में वह अनाग्रह रखता है, भले सत्य भी हो और कहीं से भी मिले वह आग्रहमुक्त भाव से उसका स्वागत और स्वीकरण करता है।
उसका ऐसा संकल्प होता है कि मैं किसी भी स्थिति में असत्य को स्वीकार नहीं करूंगा और असत्य प्रतिपादन नहीं करूंगा, भले मुझे कष्ट झेलना पड़े। ऐसा व्यक्ति, व्यक्ति और सम्प्रदाय से भी अधिक महत्त्व सत्य को देता है। वह व्यक्ति और सम्प्रदाय से अनुबद्ध नहीं रहता, सत्य से प्रतिबद्ध रहता है। जिस व्यक्ति अथवा सम्प्रदाय में सच्चाई प्राप्त होती है वह भी उसके लिए श्रद्धेय और सम्मान्य बन जाता है। उसकी कसौटी सच्चाई होती है। प्रगाढ़ सत्यनिष्ठा प्रज्ञा के शिखर पर चढ़ने का एक साधन मुझे अनुभूत हुआ है।
2. संवेग-नियंत्रण– क्रोध, लोभ, भय और वासना आदि के आवेग पर अंकुश रखना। इनको नियन्त्रित रखने का अभ्यास करना एवं यथार्थ के दर्शन में ये कहीं बाधक न बन जाएं, इसके प्रति जागरूक रहना।
3. करुणा– अहिंसा की साधना। किसी भी जीव को मेरी ओर से तकलीफ न हो जाए, ऐसा हर सम्भव प्रयास करना। औरों को दुःखमुक्त रखने के लिए स्वयं कष्ट उठा लेने की भावना रखना।
4. आत्म-निरीक्षण– प्रतिदिन एकान्त में बैठ अपनी अच्छाइयों और अपनी कमियों का तटस्थ भाव से अनुभव करना, अपनी कमियां दूसरों से भी जानना।
5. ज्ञानार्जन– नया-नया ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहना।
6. मितभाषण– बहुत कम बोलना, अनावश्यक न बोलना।
7. सरलता– छलनापूर्ण व्यवहार न करना, ऋजुता रखना। इनके अतिरिक्त और भी कुछ साधन ऐसे बन सकते हैं जिनसे प्रज्ञा का जागरण हो सकता है।
कुछ वर्ष पूर्व पूज्य गुरुदेव श्री तुलसीगणी नें मुनिश्री नथमलजी (टमकोर) को सार्थक 'महाप्रज्ञ' अलंकरण प्रदान किया। अलंकरण ने नाम का स्थान लिया। नाम 'आचार्य' विशेषण से विशिष्ट बना, आचार्य महाप्रज्ञ तेरापंथ धर्म संघ के दसवें एवं वर्तमान आचार्य के रूप में हमारे सामने हैं।
पूज्य आचार्यश्री की प्रज्ञा शिखर पर आरोहण करे। शिखर-आरोहण की यात्रा में अनेक व्यक्तियों को सहयात्री बनाएं। आपका आचार्यकाल धर्मसंघ में प्रज्ञा के स्फुलिंग विकीर्ण करे, संघ में अध्यात्म, आचार संबंधी निर्मलता व दृढ़ता का विकास हो।
एक महाप्रज्ञ से अनेक महाप्रज्ञ बनें, 'एकोऽहं बहु स्याम्' का रूप सामने आए।
जयाचार्य की लोकप्रिय कृति : चौबीसी
श्रीमज्जयाचार्य जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के चतुर्थ आचार्य थे। उनका व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व बहुआयामी था। उनके जीवन का एक महत्त्वपूर्ण आयाम था साहित्य-सृजन।
महान् तत्त्ववेत्ता होने के साथ-साथ जयाचार्य भक्त-हदय भी थे। उनके भक्ति-काव्यों में 'चौबीसी' एक लोकप्रिय गेय काव्य है। चौबीस तीर्थकरों की स्तुति में रचित होने से यह चौबीसी नाम से विख्यात है। प्रस्तुत काव्य की भाषा राजस्थानी है।
रचनाकाल
विक्रम संवत् १६००, लाडनूं में करीब आठ दिनों में इस ग्रन्थ की रचना हुई। प्रत्येक गीत का तिथिबद्ध रचना-काल इस प्रकार है-