स्वाध्याय
-आचार्यश्री महाप्रज्ञ
(4) रस-परित्याग
महावीर ने कहा है- साधक को वैसे रस पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए, जो काम-वासना को उद्दीप्त करने वाले हो। साधक ने काम-वासना के विजय के लिए प्रस्थान किया है। चेतना की प्रगति के लिए निकला हुआ साधक चेतना के विकास में बाधक तत्वों का आसेवन करे, यह लक्ष्य के निकट पहुंचने की स्थिति नहीं है। निःसन्देह वे उसे दूर ले जाते हैं। रसों के निषेध करने का तात्पर्य यही है कि चित्त बहिर्मुखी न हो।
रस शब्द से यहां वे समस्त पदार्थ ग्राह्य हैं जिनसे वृत्तियां चंचल होती हैं, चित्त अंतर्मुखता से हटता है, ध्यान 'स्व' पर केन्द्रित न होकर 'पर' की तरफ आकृष्ट होता है। इससे समग्र इन्द्रियों के रसों विषयों की प्रतिध्वनि अभिव्यक्त होती है। किन्तु रसना-जीभ सब में मुख्य है, इसलिए उसी का मुख्यतः उल्लेख किया जाता है। धवला टीका में लिखा है- 'रसनेन्द्रिय के निरोध से सकल इन्द्रियों का निरोध संभव है।'
मूलाराधना में आचार्य वट्टकेर कहते हैं- 'प्राणी इस अनादि संसार-प्रवाह में रसनेन्द्रिय और उपस्थ के कारण महान् दुःख और जन्म-मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
जो व्यक्ति संसार-दुःख से तप्त है और विषयों को विष के समान समझता है, उसे सरस भोजन के प्रति आसक्त नहीं रहना चाहिए।'
रस-परित्याग का हेतु है-इन्द्रियों की उत्तेजना पर विजय प्राप्त करना, निद्रा-विजयी होना और स्वाध्याय-ध्यान में निराबाध प्रवृत्त रहना। आचार्य कुन्दकुन्द ने लिखा है- 'वह जैन शासन को नहीं जान सकता जो आहार-विजयी, निद्रा-विजयी और आसन-विजयी नहीं है।' इससे यह प्रतिफलित होता है कि निद्रा-विजय में रस-परित्याग की भी भूमिका है। रस-विजय से जितेन्द्रियता, तेजस्विता और निराबाध-संयम (साधना) की उपलब्धि में शंका नहीं रहती।
रस शब्द से किन वस्तुओं का ग्रहण करना चाहिए, इसके संबंध में आचार्यों का अभिमत भिन्न-भिन्न है। गौरस, घी, दूध, दही, मक्खन, इक्षुरस, चीनी, गुड़, फलरस, धान्यरस, नमक आदि ये सब रस माने जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वयं अध्ययन करना है कि उसके लिए क्या उपयोगी है? कितना उपयोगी है? अपने आत्म-निरीक्षण से क्रमशः यह बहुत स्पष्ट होता चला जाता है। हम उस सत्य की उपेक्षा न करें, हमारी इच्छा है, किन्तु शरीर अपनी अनुकूलता तथा प्रतिकूलता की सूचना स्पष्टतया अभिघोषित कर देता है।