अभिनव सामायिक समता की साधना का प्रयोग है

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अभिनव सामायिक समता की साधना का प्रयोग है

पुणे।
साध्वी काव्यलताजी ने श्रद्धालु श्रावक-श्राविकाओं को स्वाध्याय योग पर संबोधित करते हुए कहा कि सामायिक की साधना से व्यक्ति जीवन को समता से आप्लावित कर सकता है, सामायिक ही जैन धर्म का सार है। पापकारी प्रवृत्तियों का त्याग कर व्यक्ति अपने आते हुए कर्मों को रोक देता है। सामायिक में ध्यान, जप, स्वाध्याय के विशेष प्रयोग कर पूर्व सचित कर्मों का निर्णय कर देता है। आत्मा को उज्ज्वल बनाता है।
आचार्यश्री तुलसी ने सामायिक को एक नया रूप प्रदान किया, वह है-‘अभिनव सामायिक’।
कार्यक्रम में सहवर्ती साध्वी ज्योतियशाजी ने त्रिपदी वंदना एवं प्रेक्षाध्यान के प्रयोग करवाए। त्रिगुप्ति साधना के प्रयोग करवाए। साध्वी सुरभिप्रभाजी ने लोगस्स का संगान एवं जप के प्रयोग करवाए।