थी संघ की एक नजीर

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साध्वी गुप्तिप्रभा

थी संघ की एक नजीर

विनय विवेक विद्या की अधिष्ठात्री श्रमणी गण की जागीर।
अनाग्रह अनावेश अनासक्ति से तोड़ती कर्मों की प्राचीर।
सहस्त्र गुणों की धारक अनगिन अर्हताओं की पुंज।
शासनमाता साध्वीप्रमुखाश्री जी थी संघ की एक नजीर।।
आचार्य त्रय की कृपा बनी धीर, वीर और गंभीर।
सातों साध्वी प्रमुखाओं थी उनमें उजली तस्वीर।
खूबियों को देख खुशमिजाजी, बन जाता था हर दर्शक।
शासनमाता साध्वीप्रमुखाश्री जी थी संघ की एक नजीर।।
भगवई आगम का संपादन करते, नहीं बनी कभी अधीर।
श्रद्धा और समर्पण की चलती प्रति पल सुख शांत समीर।।
साध्वीगण में आधार श्रृंगार और उपहार थी ललाम।
शासनमाता साध्वीप्रमुखाश्री जी थी संघ की एक नजीर।।
आखों में तेजस्विता, वाणी में ओजस्विता हरती सबकी पीर।
सहजता सुघड़ता सरलता से जीवन बना गंगा सा निर्मल नीर।।
अप्रमाद को योगक्षेम का आदर्श बनाया अपने संयम जीवन में।
शासनमाता साध्वीप्रमुखाश्री जी थी संघ की एक नजीर।।
आठवें दशक में गुरु सहयात्रा अद्भुत थी तकदीर।
साधना आराधना और प्रशासना में करती कितना तदवीर॥
प्रेरणा पाथेय या उनसे पुलकित है रोम-रोम श्रमणी गण का।
शासन माता साध्वी प्रमुखाश्री जी थी संघ की एक नजीर।।