
रचनाएं
छवि थी जिनकी सबसे न्यारी
शासनश्री साध्वी ज्योतिश्री, लगती थी सबको मनहारी।
शांति निकेतन प्रांगण में, छवि थी जिनकी सबसे न्यारी।।
गिरिगढ़ में तुमने जन्म लिया, गुरु तुलसी कर संयम लिया।
शुभ योगों से ज्योतित जीवन, गुरुत्रय किरण मंगलकारी।।
सहज सरल मृदु व्यवहारी, स्वाध्याय जाप में इकतारी।
जीवन मस्त फकीरी सा, सदगुण की नित खिलती क्यारी।।
श्री ह्री धी घृति उपशमता, समता ममता तप समरसता।
नियमितता से हर काम किया, मध्यस्थ भावना थी न्यारी।।
भिक्षुगण में खूब काम किया, सुख पूर्वक खेवा पार किया।
संयम यात्रा थी सुखकारी, अग्रिम यात्रा श्रेयस्कारी।।
पुण्योदय से यह संघ मिला, संयम सेवा शुभ योग मिला।
गुरु महाश्रमण की सुख शय्या, प्राञ्जल ग्रुप मन से आभारी।।
लय- महावीर तुम्हारे चरणों में