शत-शत शीष झुकावां हां

रचनाएं

'शासनश्री' साध्वी सुव्रता

शत-शत शीष झुकावां हां

शासण माता रे शासण माता रे चरणों में,
शत-शत शीष झुकावां हां।
कलकत्ता महानगरी में थे शुभ मुहूर्त में जन्म लियो,
तुलसी गुरु स्यूं दीक्षा लेकर जीवन सफल कियो।।
संस्कृत प्राकृत में पारंगत प्रवचन पटुता प्राप्त करी,
ज्ञान ध्यान में मस्त रहया थे कनक कसौटी पर निखरी।।
देश विदेशां में थे विचरया शासन ने चमकायो थे,
तेरापथ रो गौरव शिखरां खूब चढ़ायो थे।।
पांच दशक तक संघ सुरक्षा और शासना सुखकारी,
जागरूक बण आप कराई शासण रखवारी।।
गुरु चरणां री पावन सन्निधि जीवन नैया ने तारी,
राजधानी में आप लगाई रचना मनहारी।।
धन्य धन्य हे शासण माता बलिहारी म्हे जावां हा,
युगां युगां तक याद करांला गौरव गावां हां।।
टाबरियां री रक्षा करज्यो देता रहीज्यो पथ दर्शन,
वात्सल्य पीठ पर रंग अनूठो आज खिल्यो है मन भावन।।
लय - होली