साँसों का इकतारा

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साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा

साँसों का इकतारा

साध्वीप्रमुखा कनकप्रभा

(35)

तृप्ति की सौगात है तुम पर निछावर
पी सकूँ सागर मुझे वह प्यास दे दो
पंख अपने सौंपती हूँ आज तुमको
तुम मुझे निस्सीम नभ में वास दे दो॥

आवरण अज्ञान का है इस जगत पर
ज्योति का अवदान उसको कौन देगा?
छा रही गहरी उदासी जिंदगी में
फूल खुशियों का वहाँ कैसे खिलेगा?
अब सहारा बस तुम्हारा ही बचा है
घुट रही जो साँस उसको आस दे दो॥

दर्द से टूटा हुआ मन आदमी का
क्या भरोसा दीप आस्था का जलाए
आ रहे तूफान पर तूफान ही जब
आशियाँ अपना वहाँ कैसे बनाए?
जम रहे शैवाल जो भ्रम के निरंतर
दूर कर उनको अटल विश्‍वास दे दो॥

बरसते अंगार शीतल चाँदनी से
तिमिर का साम्राज्य दीपक के तले हो
पंथ मंजिल से स्वयं भटका हुआ है
सत्य क्या सपने न पलकों में पले हैं
दूर तक खामोशियों का एक जंगल
तुम नई उम्मीद नव उल्लास दे दो॥

(36)

जिस धरती पर जन्म तुम्हारा मिला उसे अनुपम उपहार
पहचाना जिस युग ने तुमको उसको साधुवाद सौ बार॥

मन के गीत पुकारे तुमको अधरों पर तेरा ही नाम
प्राणों में बस रहे निरंतर तुम ही हो आस्था के धाम
पूर्णकाम बनकर भी पल-पल रचते हो नूतन संसार॥

जिन आँखों में रूप तुम्हारा सार्थक है उनका होना
अंकित होते चरण जहाँ पर मिट्टी बन जाती सोना
जीवन-नभ में सूर्य उगाकर धो डालो तम का विस्तार॥

जय हो जय जीवन के केवट नाव पड़ी मझधारा में
मुक्‍त करो उन सबको जो हैं रूढ़िवाद की कारा में
तुम ही नई दिशा दे सकते झाँक लिया सागर के पार॥

अमृतपर्व की मंगल वेला सुधा पिलाओ जन-जन को
दिव्य पुरुष हो दिव्य दान से पुलकन से भर दो मन को
महाप्राण! तुमको अर्पित है मेरे सब सपने सुकुमार॥

(क्रमश:)