संसार सागर से तारने वाली नौका है दया : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

कोबा, गांधीनगर। 03 नवम्बर, 2025

संसार सागर से तारने वाली नौका है दया : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, परम दयालु, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि साधु जब प्रवचन करे तो उसमें दया की बात बताए। षट्जीवनिकाय के संदर्भ में दया को जानकर साधु व्याख्यान दे। धार्मिक साहित्य का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है — दया। दया सुखों की बेल है, सुखों की खान है। अनंत जीव दया की साधना करके मोक्ष को प्राप्त कर चुके हैं। दया संसार से तारने की नौका है।
दया किसके प्रति हो? दया प्राणी के प्रति हो सकती है। कोई दुखी प्राणी है, उसे देखकर या उसके बारे में सुनकर मन में अनुकंपा, दया का भाव आ सकता है। कोई प्राणी मरणासन्न है, उसे बचाने का भाव आना दया है। आचार्य भिक्षु जन्मत्रिशताब्दी वर्ष और आचार्य श्री तुलसी की दीक्षा का 100वां वर्ष चल रहा है। आचार्य भिक्षु ने दया पर भी सृजन किया है। उनके साहित्य में अनुकंपा और दया पर भी विचार मिलते हैं। दया के दो रूप हैं — एक लौकिक दया और दूसरी लोकोत्तर दया। कोई प्राणी कष्ट में है, उसे कष्ट से उबारने का प्रयास करना लौकिक दया है, अर्थात् जो नितांत शरीर के प्रति दया की भावना है, वह लौकिक दया है। शारीरिक संदर्भ में दया लौकिक दया है, और अध्यात्म या आत्मकल्याण के संदर्भ में होने वाली दया लोकोत्तर दया है।
लौकिक दया से भी एक रागात्मक संबंध, सद्भावना या सहयोग का संबंध जुड़ सकता है। कोई व्यक्ति आर्थिक संकट में है, उसकी शिक्षा, चिकित्सा, भोजन आदि की समस्या है, और कोई दयालु धनवान व्यक्ति उसकी आर्थिक सहायता कर दे, तो यह लौकिक दया है। सभी व्यक्तियों में दया की भावना हो, यह आवश्यक नहीं है। यह रागात्मक संबंध अगले जन्मों तक भी चल सकता है। कोई किसी प्राणी को मारे अथवा नुकसान पहुँचाए तो द्वेष का संबंध भी आगे के जन्मों तक चल सकता है। अतः शरीर संबंधी किया गया उपकार लौकिक दया की श्रेणी में आता है।
किसी की आत्मा को पाप के आचरण से बचाना लोकोत्तर दया है। कोई व्यक्ति हिंसा, मांसाहार, चोरी, जुआ, छल-कपट आदि प्रवृत्तियों में संलग्न है, और उसे उपदेश देकर, समझाकर चोरी, मांसाहार, जुआ, हिंसा और झूठ बोलने का त्याग करवाना लोकोत्तर दया है ताकि उसकी आत्मा अच्छी रहे, दुर्गति में न जाए और मोक्ष की ओर अग्रसर हो सके। तीर्थंकर भगवान लोगों के कल्याण और मार्गदर्शन के लिए प्रवचन करते हैं — यह भी लोकोत्तर दया है। प्रवचन के द्वारा किसी को त्याग करवाना, मुमुक्षु बनाना और साधु दीक्षा देना भी लोकोत्तर दया के कार्य हैं। किसी को आत्मकल्याण की भावना से सम्यक्त्व दीक्षा दिलाना भी लोकोत्तर दया का कार्य है।
आचार्य भिक्षु ने बताया कि जीव अपने आयुष्य बल से जीता है, वह हमारी दया नहीं है। कोई जीव मरता है तो हम उसकी हिंसा के भागीदार नहीं हैं। जो मरता है वह हिंसा का त्याग करता है — इस प्रकार भीतर में जो अहिंसा की भावना है, वह लोकोत्तर दया है। अतः आत्मा को पाप से बचाना लोकोत्तर दया है और शरीर के संदर्भ में किसी को बचाना लौकिक दया है। लोकोत्तर दया नितांत आत्मकल्याणकारिणी और मोक्ष की ओर ले जाने वाली है, जबकि लौकिक दया सांसारिक संबंध बनाने वाली दया है।
स्वयं की आत्मा को भी पाप से बचाना लोकोत्तर दया है। आचार्यप्रवर के मंगल प्रवचन से पूर्व साध्वीवर्या संबुद्धयशाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि श्रावक जिनशासन का अविमाज्य अंग है। वह अपनी मति और अपनी गति से शासन की प्रभावना करता है। गति से तात्पर्य श्रावक के आचरण और व्यवहार से है। श्रावक परिवार और समाज की भूमिका में रहते हुए अपना धार्मिक जीवन भी जीता है और अपने उन्नत चिंतन से संघ की प्रभावना करता है। आज अहमदाबाद चातुर्मास व्यवस्था समिति की ओर से मंगल भावना समारोह का भी आयोजन हुआ, जिसमें सर्वप्रथम तेरापंथ महिला मंडल, अहमदाबाद ने विदाई गीत का गायन किया। अनेक श्रद्धालुओं ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। श्री भिक्षु भजन मंडली ने गीत की प्रस्तुति दी।
अमराईवाड़ी तेरापंथ महिला मंडल ने भी गीत का गायन किया। मुनि जितेन्द्रकुमारजी द्वारा लिखित ‘‘शासनश्री मुनि राजेन्द्रकुमारजी’’ की जीवनी को जैन विश्व भारती की ओर से लोकार्पित किया गया। साध्वी सरस्वतीजी ने इस संदर्भ में अपनी भावाभिव्यक्ति दी। मुनि जितेन्द्रकुमारजी ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। साध्वी प्रमुखाजी, साध्वीवर्याजी व मुख्य मुनिश्री ने इस संदर्भ में अपनी भावाभिव्यक्ति दी। आज के दिन जीवन विज्ञान दिवस है। इस संदर्भ में आचार्यश्री ने कहा कि आज ही के दिन मुनि नथमलजी टमकोर को ‘महाप्रज्ञ’ की उपाधि प्राप्त हुई थी। जब वे युवाचार्य बने, तब उनका नाम महाप्रज्ञ रख दिया गया। शिक्षा जगत व विद्यार्थियों में अच्छे ज्ञान का विकास होता रहे। अणुविभा की ओर से रतन दूगड़ ने अपनी अभिव्यक्ति दी। आचार्यश्री ने दो संतों को बिठाकर जीवन विज्ञान दिवस के रूप में प्रयोग भी करवाया।