गुरुवाणी/ केन्द्र
ज्ञान का भूषण है निरहंकारता : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अखंड परिप्रात्रक, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने आयारो आगम के माध्यम से अमृत देशना प्रदान करते हुए फरमाया कि ज्ञान का बहुत महत्व है। ज्ञान, अध्यात्मविद्या और लौकिक विद्या — दोनों प्रकार की विद्याओं का हो सकता है। शिक्षा संस्थाओं में कई विद्यार्थी अध्ययन करते हैं। उनमें से कई अच्छा विकास करके विद्वान बन जाते हैं, और कई अपेक्षाकृत कम विकास कर पाते हैं तथा अल्पज्ञ रह जाते हैं। जिन्होंने बहुत अच्छा अध्ययन कर लिया, उनमें घमंड आ सकता है, और जिन्होंने थोड़ा अध्ययन किया हो, उनमें भी कई बार अहंकार आ सकता है। अपने आपको विद्वान समझने लगना और दूसरों को सामान्य या अल्पज्ञ समझना — इस प्रकार के भाव ‘मान’ कषाय के कारण उत्पन्न होते हैं।
संस्कृत श्लोक के माध्यम से कवि कहता है कि जब मैं थोड़ा जानने लगा, तब मैं हाथी की तरह मदांध हो गया। मैंने मन में मान लिया कि मैंने सब कुछ जान लिया है। जब मैं कई बड़े विद्वानों से मिला और उनकी विद्वत्ता को देखा, तो मुझे अहसास हुआ कि इनके ज्ञान के सामने मेरा ज्ञान कितना कम है। तब मेरे अहंकार का ज्वर भी उतर गया। ्ञान अनंत है। ज्ञान होने पर भी मौन रहना चाहिए, दिखावा नहीं करना चाहिए। शक्तिशाली होने पर भी क्षमा रखना, दान देकर भी नाम की भावना नहीं रखना चाहिए।
शास्त्र में कहा गया है कि कुछ लोग अल्पज्ञ होते हुए भी अपने आपको विद्वान के रूप में प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार के अहंकार से हमें बचना चाहिए। ज्ञान और ज्ञानी के प्रति विनय का समुचित भाव होना चाहिए। अहंकार का भाव नहीं होना — अर्थात् निरहंकारता ज्ञान का भूषण है। विद्या विनय से शोभित होती है। अतः हमें अपने पांडित्य को दिखाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। यह सकाम भावना नहीं होनी चाहिए, और व्यक्ति को निरहंकारता का जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए।
गृहस्थ जीवन में ज्ञान के अतिरिक्त धन, बल, लब्धि, सत्ता, पद आदि का घमंड आ सकता है, परन्तु इनका घमंड नहीं करना चाहिए, किसी का अहित नहीं करना चाहिए। सत्ता और पद का उपयोग सेवा करने में करना चाहिए। सघन साधना शिविर के शिविरार्थियों को अच्छा बनना, योग्य बनना चाहिए, पर अहंकार को साथ में नहीं रखना चाहिए। योग्यता के साथ यदि अहंकार जुड़ता है तो योग्यता दूषित हो जाती है, और विनम्रता के जुड़ने से योग्यता भूषित हो जाती है। अतः हमें अपनी योग्यता को दूषित नहीं होने देना चाहिए और निरहंकारता का भाव रखना चाहिए।
मंगल प्रवचन के उपरांत साध्वीवर्या संबुद्धयशाजी ने उनके निर्देशन में संचालित बहनों के सघन साधना शिविर के संबंध में अपनी अभिव्यक्ति दी तथा शिविर संचालन एवं प्रगति से संबंधित जानकारी प्रस्तुत की। सघन साधना शिविर की शिविरार्थी बहनें जयश्री नाहटा, कोमल जीरावला, तनिशा चौपड़ा, शिखा संचेती ने अपनी प्रस्तुति दी। इसके पश्चात् शिविरार्थियों ने सामूहिक गीत प्रस्तुत किया। तत्पश्चात् पूज्य गुरुदेव ने शिविरार्थियों से संवाद किया तथा उनके द्वारा सीखे ज्ञान की संक्षिप्त परीक्षा भी ली। पूज्य गुरुदेव ने पच्चीस बोल तथा प्रतिक्रमण कंठस्थ करने की प्रेरणा प्रदान की। शाही बाग ज्ञानशाला के ज्ञानार्थियों ने निर्जरा तत्त्व के भेद वैयावृत्य पर अपनी प्रस्तुति दी। पूज्य गुरुदेव ने आशीर्वचन प्रदान किया।
कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार जी ने किया।